लापरवाही:खाद्य सामान, फल-सब्जियों में बैक्टीरिया-वायरस की जांच के लिए प्रदेश में बनी पहली लैब नहीं हो सकी शुरू

लेबोरेटरी के काम न करने से खाने से जुड़ी चीजों के सैंपल अब भी दूसरे प्रदेशों में भेजे जा रहे मशीनें शुरू हुईं तो ट्रांसफार्मर लोड नहीं ले पाया, अब तीन लाख खर्चे के चक्कर में 4.33 करोड़ की प्रयोगशाला बंद अगर आपने कोई दूषित केक खा लिया और आप यह जानना चाहते हैं कि उसमें ऐसे कौन से वैक्टीरिया-वायरस थे, तो आप यह पता नहीं कर पाएंगे। क्योंकि प्रदेश की पहली माइक्रोबायोलॉजी फूड टेस्टिंग लेबोरेटरी 506 दिन बाद भी शुरू नहीं हो पाई है। इस लैब को बनाने की मांग कई सालों से चल रही थी। छत्तीसगढ़ में अभी खाने के सामान, फल-सब्जियों में कौन से वैक्टीरिया-वायरस आ रहे हैं, इसकी जांच के लिए सैंपल दूसरे प्रदेशों में भेजना पड़ता है। 25 फरवरी 2024 को जब लैब का लोकार्पण किया गया, तो यह बात भी कही गई कि अब सूक्ष्म जीवाणुओं की जांच प्रदेश में ही हो जाएगी। पहले तीन-चार महीने लैब के लिए सामान खरीदी और मैनपावर में निकल गए। फिर बरसात में छत टपकने लगी। वह सही हुई तो मशीनों को चालू किया गया तो ट्रांसफार्मर जल गया। बिजली विभाग ने खाद्य नियंत्रक को बताया कि मशीनों का लोड ट्रांसफार्मर नहीं ले पा रहा है। आपको लोड बढ़ाकर नया ट्रांसफार्मर लगवाना होगा। इसकी फाइल एक महीने पहले सीएजीएमसी में भेजी गई है, लेकिन 3 लाख का ट्रांसफार्मर आज तक नहीं खरीदा जा सका।
अभी हो रही सामान्य जांच
कुछ दिनों पहले ही बड़े स्तर पर नकली पनीर पकड़ा गया। लेकिन उसकी सामान्य जांच ही रायपुर में हो पाई। पनीर के अंदर कौन से वैक्टीरिया-वायरस हैं, इसकी जांच नहीं हो पाई। लैब से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि माइक्राबायोलॉजी लैब इंदौर-दिल्ली में हैं। हर महीने एक-दो सैंपल हम यहां भी भेजते हैं, लेकिन अगर हमारी लैब शुरू हो जाती तो हर दिन यहां 20-30 सैंपल की जांच हो पाती। इस माइक्रोबायोलॉजी फूड टेस्टिंग लैब का 506 दिन पहले हुआ था उद्घाटन अंदर से ऐसी है लैब
देश की हाईटैक लेब में से एक है। बड़े-बड़े रेफ्रीजेरेटर व बड़ी मशीनें लगी हैं। करीब 6 कमरों में बनी लैब में कई जांच तो सात दिन तक होने वाली हैं। मशीनों को एक-दूसरे से जोड़ा है। अभी यहां ताला लगा रहता है। किसी बाहरी का भी प्रवेश वर्जित है। यही नहीं इस लैब के लिए विभाग की तरफ से 6 लोग नियुक्त हैं, उन्हें दूसरे कामों मेंं लगा रखा है। तीन साल में डेढ साल तो बीत गए
लैब का ठेका सेवन स्टैप कंसलटोर्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को दिया गया है। ठेके में मशीनों को स्टैबलिश करने से लेकर तीन साल तक रखरखाव का जिम्मा भी कंपनी काे दिया। कंपनी ने अपने दो कर्मचारी यहां रख रखे हैं। जिनका काम मशीनों को साफ सुथरा करते रहना है। लेकिन डेढ़ साल से मशीनें चली ही नहीं। ऐसे में अब सिर्फ डेढ़ साल का मेंटनेंस कंपनी के पास बचा है। इसके बाद उसे अलग से पैसे देने पड़ेंगे। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. अजय त्रिपाठी, प्रोफेसर, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, गर्वमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज बंद मशीनें खराब हो ही जाती हैं
^हर टेस्टिंग इक्यूपमेंट में सेंसर लगे होते हैं। हर सेंसर की लाइफ होती है। कुछ दिन में अगर उन्हें नहीं चालू किया जाता है तो सेंसिंग कम होने लगती है। रेफ्रीजेरेटर के कंप्रेशर में लुब्रिकेंट होते हैं। लुब्रिकेंट की एक समय सीमा होती है। चालू नहीं होने की वजह से लुब्रिकेंट खराब हो जाते हैं। एक कंप्रेशर दो साल नहीं चले तो वह एक बार में चालू नहीं होगा। उसे एक्सपर्ट से दिखाना ही होगा। इंजीनियरिंग का नियम है कि हर मशीन को 10-15 दिन में चलाना जरूरी होता है। वरना मशीनों में कोई न कोई खराबी आ ही जाती है। माइक्रोबायोलॉजी लैब में लगी मशीनों के हिसाब से ट्रांसफार्मर की क्षमता नहीं है। इसके लिए नए ट्रांसफार्मर के लिए सीजीएमएससी को पत्र लिखा है। मैनपावर हेतु भर्ती प्रक्रियाधीन हैं।
दीपक अग्रवाल, खाद्य नियंत्रक

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