‘महाराजा’ थे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और ‘महारानी’ बनीं कैबिनेट मंत्री

आजादी के बाद देसी रियासतों का विलय भारतीय संघ में हो गया। इसके बाद अनेक राज परिवार लोकतांत्रिक भारत की राजनीति और सत्ता में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। कुछ राज परिवार के सदस्य प्रशासनिक सेवाओं में भी आते रहे हैं। जहां तक छत्तीसगढ़ का प्रश्न है यहां की चौदह देसी रियासतों के अनेक राजे-महराजे राजनीति में सक्रिय रहे हैं। इन चौदह रियासतों में से खैरागढ़ और सारंगढ़ के राज परिवार सबसे अधिक प्रभावी रहे हैं। कुछ अन्य राज परिवार और जमींदार भी समय-समय पर अपनी राजनीतिक शक्ति प्रदर्शित करते हुए विधायक, सांसद और मंत्री बनते रहे हैं। देवेंद्र कुमारी 1980 में पहली बार बनीं विधायक
सत्ता की राजनीति और प्रशासनिक सेवा का एक अनूठा मेल 1980 के दशक में सामने आया था। सरगुजा राज की ‘महारानी‘ देवेन्द्र कुमारी सन् 1980 में बैकंुठपुर विधानसभा क्षेत्र से पहली बार मध्यप्रदेश विधानसभा की सदस्य चुनी गईं। वे सरगुजा की महारानी बनने से पहले हिमांचल प्रदेश की प्रभावशाली जुब्बल रियासत की राजकुमारी थीं। इस तरह वे दो जाने-माने राज परिवारों की विरासत की धनी थीं। उस समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह थे जो सीधी जिले की चुरहट जागीर के कुंवर साहब थे। उन्होंने 1983 में देवेन्द्र कुमारी सिंहदेव को अपने मंत्रिमण्डल में आवास एवं पर्यावरण विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाकर शामिल किया। देवेन्द्र कुमारी सिंहदेव का कैबिनेट मंत्री बनना कोई अनूठी बात नहीं थी। उल्लेखनीय बात यह थी कि उस समय मध्यप्रदेश शासन के अंतर्गत उनके पति और ‘‘सरगुजा राज के 116वें महाराजा‘‘ मदनेश्वर शरण सिंह देव वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। वे अपने पूरे नाम के बजाय एम.एस. सिंहदेव या महाराज साहब के रूप में ज्यादा जाने जाते थे। सिंहदेव को मिलता था सम्मान
उस काल में मध्यप्रदेश के अनेक राज परिवार के सदस्य विधायक, सांसद या मंत्री थे। इनमें से लगभग सभी सिंहदेव साहब को निजी और सार्वजनिक रूप से राज परिवार की परंपरा के अनुसार सम्मान दिया करते थे। एम.एस. सिंहदेव को एक आईएएस अधिकारी रहते हुए राजनीतिज्ञों से जो सम्मान मिलता था वैसा अन्य किसी आईएएस अधिकारी को शायद ही कभी मिला हो। पहले प्रयास में आईएएस बने
उल्लेखनीय है कि एम.एस. सिंहदेव ने 1952 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में एमए की परीक्षा प्रवीणता के साथ पास की थी। और वे प्रख्यात इतिहासकार तथा सीतामऊ राजघराने के राजकुमार रघुवीर सिंह के निर्देशन में पीएचडी के लिए शोधकार्य में जुट गए थे। लेकिन अपने परिवार के आग्रह पर 1953 में आईएएस की परीक्षा दी। वे पहले ही प्रयास में सफल हुए और वरीयता क्रम में 44वंे स्थान पर आए। उन्हें मध्यप्रदेश काडर मिला। वे कई जिलों में कलेक्टर, भोपाल संभाग के कमिश्नर, राज्य के राजस्व मंडल के अध्यक्ष आदि पदों पर रहते हुए 1988 में मुख्य सचिव बने थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि एम.एस. सिंहदेव को राजस्व मामले के सबसे अधिक जानकार के रूप में प्रतिष्ठा मिली थी। सेवानिवृत्त होने पर उन्हें मध्यप्रदेश योजना मंडल का उपाध्यक्ष बनाया गया था जिस पद पर वे अनेक वर्ष तक कार्य करते रहे।

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