चंद्रशेखर आजाद का आखिरी साथी ‘सुखदेव राज’:अंग्रेजों से भिड़े, 1500 दिनों की सजा काटी, फिर छत्तीसगढ़ आकर गुमनाम हो गए

तारीख- 27 फरवरी 1931 जगह- अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद अल्फ्रेड पार्क के एक कोने में 2 लोग धीमे-धीमे कदमों से चलकर एक बेंच पर आकर बैठे। यह कोई साधारण मुलाकात नहीं थी। एक तरफ थे क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद, और दूसरी ओर उनके युवा साथी सुखदेव राज। कुछ ही देर पहले वे शहर के एक बड़े नेता के घर से लौटे थे, लेकिन पंडित जी के चेहरे की गंभीरता बता रही थी कि मन के भीतर कोई तूफान चल रहा है। “राज…भगत, राजगुरु, सब जेल में हैं…हमें ये ज्वाला बुझने नहीं देनी है,” आजाद की आवाज में दृढ़ता थी, लेकिन आंखों में चिंता की हल्की परत भी तैर रही थी। सुखदेव राज चुपचाप सुनते रहे। आधा घंटा बीता ही था कि आजाद की पैनी निगाहों ने चारों ओर फैलते साये देख लिए। घेराबंदी शुरू हो चुकी थी। पांच हजार के इनामी क्रांतिकारी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश अंग्रेज सरकार पहले ही दे चुकी थी। तभी सामने की सड़क पर आकर एक मोटर रुकी। उसमें से अंग्रेज अफसर नॉट बावर और दो सादे कपड़ों में सिपाही उतरे। सुखदेव राज के अनुसार, मोटर रुकते ही शक गहरा गया। नॉट बावर हाथ में पिस्तौल लिए सीधा उनकी ओर बढ़ा और अंग्रेजी में सवाल दागा “तुम लोग कौन हो? यहां क्या कर रहे हो?” जवाब शब्दों में नहीं, गोलियों में दिया गया। पलक झपकते दोनों ओर से फायरिंग शुरू हो गई। नॉट बावर की गोली आजाद की जांघ में लगी, जबकि आजाद की गोली अफसर के कंधे को चीर गई। अंग्रेज अफसर पार्क में मौलश्री के पेड़ की आड़ में जा छिपा, उसके सिपाही नाले में दुबक गए। आजाद और सुखदेव राज ने जामुन के पेड़ की ओट ले ली। गोलियों की आवाज पूरे पार्क में गूंज रही थी। इसी बीच आजाद ने कहा “राज, तू भाग…हर क्रांतिकारी की जान कीमती है।” सुखदेव राज ने आदेश मानते हुए पार्क से बाहर छलांग लगाई, रास्ते में एक लड़के को पिस्तौल दिखाकर साइकिल ली और सीधे चांद प्रेस पहुंच गए। सुखदेव राज के चांद प्रेस पहुंचते ही खबर फैल चुकी थी कि अल्फ्रेड पार्क में मुठभेड़ हो रही है। कुछ ही देर बाद इलाहाबाद में गोलियों की आवाज थम गई, लेकिन क्रांति का एक दीपक बुझ चुका था। पंडित चंद्रशेखर आजाद शहीद हो गए थे। पहले देखिए ये तस्वीरें- उस दिन के बाद इतिहास ने सुखदेव राज को भुला दिया उस दिन के बाद सुखदेव राज अंग्रेजों की नजरों से ओझल हो गए। गिरफ्तारी से बचने के लिए वे लगातार ठिकाने बदलते रहे। आजादी की लड़ाई में उनका नाम गूंजा, लेकिन 1947 के बाद जैसे इतिहास की किताबों ने उन्हें धीरे-धीरे किनारे कर दिया। आजादी मिलने के बाद सुखदेव राज ने किसी राजनीतिक पद या नाम-दाम की चाह नहीं की। वे छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के अंडा गांव में आकर बस गए। यहां उन्होंने अपना बाकी जीवन सादगी से बिताया। बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी थी कि गांव का यह शांत स्वभाव वाला व्यक्ति कभी चंद्रशेखर आजाद का आखिरी साथी था। इस तरह पहुंचे थे दुर्ग मुठभेड़ के बाद भी वे कई ठिकाने बदलते हुए वे आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहे। भगवती चरण वोहरा के करीबी, कई अहम घटनाओं के चश्मदीद, और 1500 दिनों की सजा काट चुके इस क्रांतिकारी को आजादी के बाद भी मंच, सम्मान या पहचान की तलाश नहीं थी। आजादी के बाद वे कोलकाता में सेवाएं दे रहे थे। भूदान आंदोलन के आचार्य विनोबा भावे से मुलाकात हुई। भावे ने उन्हें छत्तीसगढ़ जाने की सलाह दी। दुर्ग जिले में 1960 के दशक में कुष्ठ रोग की बड़ी समस्या थी। 1963 में सुखदेव राज दुर्ग पहुंचे और जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर अंडा गांव में आनंद आश्रम की स्थापना की। सालों तक उन्होंने गांव में सेवा कार्य किए। गरीब बच्चों को पढ़ाना, सामाजिक कार्यक्रमों में मदद करना और बीमारों की देखभाल करना। न कोई मंच, न कोई सम्मान, न अखबारों की सुर्खियां। जब उनका निधन हुआ, तब भी कई लोग यह नहीं जानते थे कि उनके बीच रहने वाला यह साधारण-सा व्यक्ति हिंदुस्तान के सबसे बड़े क्रांतिकारियों में से एक था। गांव के लोगों को नहीं बताया कि वे क्रांतिकारी थे अंडा गांव के ही रिटायर्ड शिक्षक जयराम चंद्राकर बताते हैं कि सुखदेव राज भगवा कपड़े पहन कर जीवन भर कुष्ठ रोगियों की सेवा में जुटे रहे। गांव के लोग उन्हें सम्मान से “स्वामीजी” कहकर पुकारते थे। चंद्राकर ने बताया कि “नौकरी लगने के बाद मैं कवर्धा चला गया। सालों बाद, जब उनकी मृत्यु के बाद उनकी प्रतिमा का अनावरण हुआ, उस कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल और शहीद भगत सिंह के भाई कुलतार सिंह आए थे। तब मुझे पता चला कि जिनके साथ मैंने बचपन के दिन बिताए, वे चंद्रशेखर आजाद के आखिरी साथी और एक महान क्रांतिकारी थे। पूर्व महाधिवक्ता की यादों में सुखदेव राज पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी बताते हैं कि तब मैं रायपुर साइंस कॉलेज में अंग्रेजी का व्याख्याता था। 1969 में दुर्ग तबादला होने पर पहली बार उन्होंने सुखदेव राज का नाम सुना। इंदिरा मार्केट के पास शिशु कल्याण केंद्र में सरोजनी नायकर के साथ रहते इस क्रांतिकारी से उनकी मुलाकात हुई। कई लोगों को विश्वास नहीं था कि यह वही सुखदेव राज हैं, जो आजाद के आखिरी साथी थे। पूर्व महाधिवक्ता ने आगे बताया कि सुखदेव राज के बारे में जानने ने के लिए उन्होंने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में अधिवक्ता परिषद की लाइब्रेरी में रखे ऑल इंडिया जर्नल और 1930-31-32 और 33 की पुरानी किताबें निकाली। इसमें मुझे सुखदेव राज के खिलाफ 3 मुकदमे मिले, जो आजादी की लड़ाई के समय उन पर लगे थे। उन्हें 1500 दिनों की सजा हुई थी। किताब में घटना का जिक्र दुर्ग में साथ रहे कुलबीर सिंह भाटिया बताते हैं कि सुखदेव राज कभी भी किसी को अपना परिचय क्रांतिकारी के तौर पर नहीं देते थे। एक बार रायपुर स्टेशन पर महाकौशल अखबार के पूर्व संपादक और क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशम्पायन ने उन्हें देखा और तुरंत पहचान लिया। उन्होंने आगे बढ़कर कहा- आप तो चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के साथी सुखदेव राज हैं। सुखदेव राज ने हल्की मुस्कान के साथ हामी भरी। वैशम्पायन ने उनकी ओर इशारा करते हुए पूछा- ये क्या पहन रखा है? सुखदेव राज ने शांत स्वर में उत्तर दिया- वो सुखदेव तो मर गया। तब वैशम्पायन ने उन्हें बताया कि उनके साथ रहे क्रांतिकारी यशपाल ने चंद्रशेखर आजाद के अंतिम क्षणों में उनके भाग जाने को लेकर अपनी किताब में कई बातें लिखी हैं। उन्होंने सुखदेव राज को सलाह दी कि वे अपनी सच्ची कहानी खुद लिखें। इसी सलाह पर सुखदेव राज ने ‘जब ज्योति जगी’ नाम की किताब लिखी, जिसमें उन्होंने अल्फ्रेड पार्क में आजाद के साथ बिताए अपने अंतिम पलों का विस्तार से उल्लेख किया। कलेक्टर को पेंशन के लिए लिखा दिलचस्प पत्र सुखदेव राज कभी पेंशन लेने के इच्छुक नहीं थे। लेकिन वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल के आग्रह पर उन्होंने पेंशन का फार्म भरा। बावजूद इसके, उन्हें पेंशन नहीं मिली। 21 अगस्त 1972 को उन्होंने इस बारे में दुर्ग कलेक्टर को एक पत्र लिखा- जिसकी प्रति आज भी उपलब्ध है। पत्र में सुखदेव राज ने लिखा प्रति, आदरणीय सक्सेना साहब, दुर्ग। बाबत- पेंशन, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की। मैंने स्वतंत्रता सेनानी की हैसियत से एक दरखास्त भारत सरकार को पेंशन के लिए मार्च 1972 में दी थी। आपके ऑफिस से मालूम हुआ कि जुलाई 1972 में यह दरखास्त एडीओ दुर्ग के पास जांच के लिए भेजी गई थी, जिसका उत्तर अब तक भारत सरकार को नहीं भेजा गया है। यह भी मालूम हुआ है कि भारत सरकार ने 8 जून 1972 को कुछ और जानकारी सेनानियों के बारे में मांगी थी, जो कागज अभी तक आपके ऑफिस में अटके हुए हैं। किस्सा मशहूर है कि फिरदौसी कवि को ईरान के शाह ने पेंशन मंजूर की थी, लेकिन पेंशन की मुहरें उन्हें तब मिली जब उनका जनाजा उठ रहा था। आशा है कि आपके ऑफिस से कार्यवाही में इतनी देर नहीं लगेगी। उनके इस व्यंग्यपूर्ण और चुभते हुए अंदाज में लिखे गए पत्र से साफ था कि वह न तो सरकारी सुस्ती से प्रभावित थे, न ही अपने स्वाभिमान से समझौता करने को तैयार। पंजाब से थे, छत्तीसगढ़ में बसे, गुमनामी में बिताई जिंदगी सुखदेव राज का जन्म 7 दिसंबर 1907 को लाहौर (पंजाब) में हुआ था। आजादी के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा करते हुए छत्तीसगढ़ में बिताया। 5 जुलाई 1973 को दुर्ग स्थित कुष्ठ सेवा केंद्र में सुखदेव राज का निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार शहर के हरना बांधा मुक्तिधाम में किया गया था। 3 साल बाद वर्ष 1976 में अंडा में उनके सेवा स्थल पर स्मारक और प्रतिमा स्थापित की गई। हालांकि, वह व्यक्ति, जिसने अंग्रेजों की गोलियों का सामना किया, भगत सिंह और आजाद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ा उसे छत्तीसगढ़ में वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा मिलना चाहिए था। कनक तिवारी, कुलबीर सिंह भाटिया और उनके साथियों ने मिलकर बाद में उनके आश्रम (जो अब एक मिल में बदल चुका है) में प्रतिमा स्थापित करवाई। अनावरण में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल, शहीद भगत सिंह के छोटे भाई कुलतार सिंह शामिल हुए थे। इसके अलावा रामकृष्ण खत्री, गंगाधर गुप्त,राजेन्द्र पाल सिंह वारियर, भगवान दास माहौर और मम्मनाथ गुप्त जैसे 5 क्रांतिकारी भी इसमें शामिल रहे। लेकिन आज भी उनकी मूर्ति सही जगह लगाने और उन्हें उचित सम्मान दिलाने की कोशिश जारी है। सुखदेव राज सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, वे उन चुनिंदा क्रांतिकारियों में से थे जो जान की बाजी लगाकर लड़े, और फिर गुमनामी में खो गए। अंडा गांव की गलियों में, कुष्ठ रोगियों की सेवा में, बिना किसी तमगे या उपाधि के।

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