भारत में प्राचीन काल से एक नियमनकारी व्यवस्था के रूप में पंचायतें कार्य करती रही हैं। ये पंचायतें अनेक स्थानों पर गणतांत्रिक शासन प्रणाली, प्रतिनिधि विचारण मंडल तथा स्वशासी संस्था के रूप में कार्य कर रही थीं। अंग्रेजी शासन काल में स्वशासन की मांग को देखते हुए पंचायतों की स्थापना के लिए 1882-83 में जिले और जमींदारी स्तर पर स्थानीय मंडलों की स्थापना की गई। बाद में 1919-20 में पंचायतों को और मजबूत बनाने के लिए कानून बनाया गया। तद्नुसार जिले और तहसील स्तर पर आज की जिला पंचायत, जनपद और ग्राम पंचायत के अनुरूप संस्थाएं काम करने लगीं। राज्यों में 1946 में निर्वाचित सरकार स्थापित होने पर पंचायतों को अधिक शक्ति देने के लिए कानूनी प्रयास किये गए। बहरहाल, आजादी के बाद पंचायतों के निर्वाचन, समयावधि और शक्तियों की अनिश्चितता के कारण धीरे-धीरे पंचायतों का महत्व कम होता गया। बहरहाल, 1992 में भारत के संविधान ने 73वां संशोधन कर पंचायत राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया। और देश में 24 अप्रैल, 1993 से पंचायत राज लागू हो गया। 1946 में बनीं न्याय पंचायतें
इसके बीच की एक घटना बहुत महत्वपूर्ण है। सन् 1946 में मध्यप्रांत तथा बरार अधिनियम लागू कर गांवों का अलग-अलग समूह बनाकर उनके लिए न्याय पंचायत गठित करने का निर्णय लिया गया। ये न्याय पंचायतें शुद्ध रूप से न्यायिक निकाय थे जिन्हें छोटे-मोटे अपराधों पर विचार करने और साधारण स्वरूप के विवादों को निपटाने की शक्तियां दी गई थीं। प्रत्येक नई पंचायत में कम से कम पांच सदस्य होते थे। पहले न्याय पंचायतों के लिए पंचों के नाम तीन वर्ष के लिए शासन के द्वारा तय किये जाते थे। 50 रु. तक जुर्माना कर सकती थीं न्याय पंचायतें
सन् 1947 में आजादी मिलने के बाद गठित राज्य सरकार के प्रभाव से इन न्याय पंचायतों ने प्रभावी रूप से कार्य करना शुरू किया। तद्नुसार राज्य शासन द्वारा न्याय पंचायत के सदस्य नामांकित करने की प्रणाली समाप्त की गई। उसके स्थान पर यह निर्णय लिया गया कि ग्राम पंचायत के निर्वाचित सदस्य में से पांच सदस्य पांच वर्ष की अवधि के लिए चुने जाएंगे। न्याय पंचायतों को उस समय 100 रू. की सीमा तक सिविल शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार दिया गया। न्याय पंचायतों को उस समय प्रचलित भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत कुछ छोटे-मोटे अपराधों पर विचार करने का भी अधिकार दिया गया। न्याय पंचायतें 50 रू. तक का जुर्माना कर सकती थीं। एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि न्याय पंचायतों के समक्ष कोई वकील, अधिवक्ता या विधि व्यवसायी किसी मामले की पैरवी नहीं कर सकता था। केवल संबंधित व्यक्ति ही न्याय पंचायत के सामने दलील रख सकते थे। इनके निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं हो सकती थी
एक और बड़ी बात यह है कि न्याय पंचायतों के निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं हो सकती थी। हां, न्याय पंचायत के निर्णय के पुनरीक्षण का आवेदन द्वितीय अपर जिला तथा सत्र न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता था। जहां तक उस समय के रायपुर जिले का संबंध है, 1947-48 में यहां कुल 906 ग्राम पंचायतों से चुने गए सदस्यों को लेकर 119 न्याय पंचायतें कार्यरत थी। एक उल्लेखनीय बात यह है कि न्याय पंचायतों के निर्णय के विरुद्ध कोई बहुत बड़ी संख्या में सिविल या दाण्डिक पुनरीक्षण के आवेदन भी नहीं किए जाते थे और जो आवेदन किये भी जाते थे उनका निराकरण प्रायः शीघ्र हो जाता था। ये संस्थाएं 1947-48 के बाद 1960 के दशक तक लगातार काम करती रहीं। बहरहाल, स्थानीय गुटबंदी और राजनीति के कारण इन न्याय पंचायतों की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं रह सकी। ग्राम पंचायतों की भांति इनकी कार्यप्रणाली भी दूषित होने लगी। इसी के चलते धीरे-धीरे इनका महत्व कम-से-कम होता गया और अंततः न्याय पंचायत जैसी महत्वपूर्ण संस्था का समापन हो गया।
ग्रामीण-क्षेत्र में न्याय करने के लिए स्थापित की-गई थीं न्याय-पंचायतें:छोटे मोटे अपराधों पर विचार करने व साधारण विवादों को निबटाने की दी गई थीं शक्तियां

















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