ढोलकल गणेश:हजार साल पुरानी प्रतिमा के 58 हिस्से जोड़े, पर सूंड़ नहीं मिली

गणेश पूजा पर हर गली-मोहल्ले में बप्पा विराजे हैं। इस समय जब मैं गणेश की प्रतिमाओं को सजते-संवरते देखता हूं, तो मुझे बरबस वह दिन याद आता है जब ढोलकल गणेश हमारे सामने बिखरे पड़े थे। 26 जनवरी 2017 को सिरपुर में पद्मश्री अरुण कुमार शर्मा के साथ पुरातत्त्वीय कार्य के दौरान सूचना मिली कि दंतेवाड़ा के ढोलकल पर्वत पर स्थित प्राचीन गणेश प्रतिमा को कुछ असामाजिक तत्वों ने नीचे धकेल दिया है। यह खबर न सिर्फ पुरातत्व जगत बल्कि हजारों श्रद्धालुओं के लिए गहरा सदमा थी। शाम तक पुलिस, प्रशासन और ग्रामीण प्रतिमा के टुकड़े इकट्ठा करने में जुट गए। शाम को ही हम वहां के लिए निकल गए। जब हम पहाड़ पर पहुंचे तो हर कोई स्तब्ध था। ग्रामीण रो रहे थे। पुलिस और प्रशासन की टीमें खंडहर में टुकड़े खोज रही थीं। आखिरकार छोटे-बड़े मिलाकर 58 टुकड़े इकट्ठा किए गए। सवाल यह था कि अब आगे क्या होगा? कैसे होगा? पहलेः 3००० फीट पर गणपति गांववालों के साथ अधिकारियों की मौजूदगी में बैठक हुई। शुरुआत में विचार था कि मूर्ति को जोड़कर संग्रहालय में रखा जाए और पहाड़ पर प्रतिकृति स्थापित कर दी जाए। ताकि मूल प्रतिमा सुरक्षित रहे। लेकिन तभी गांववालों की आवाज गूंजी-हमारे देवता जहां थे, वहीं रहेंगे। हम उन्हें कहीं और नहीं ले जाने देंगे।” उनकी यह जिद हमें झकझोर गई। हमने महसूस किया कि यह सिर्फ पत्थर की मूर्ति नहीं, यह जीती-जागती आस्था है। तय हुआ कि मूल प्रतिमा वहीं रखी जाएगी। असामाजिक तत्वों ने गिराई मूर्ति ढोलकल पर्वत, बैलाडिला का ही हिस्सा है जहां के चट्टानों में लौह अयस्क पाया जाता है। वहां हमारे छेनी-हथौड़ी जैसे औजार बेअसर साबित हुए। फिर पहाड़ पर जनरेटर और स्टोन कटर की मदद से महज 25×50 सेंटीमीटर का एक इंच गहरा सॉकेट बनाने में ही डेढ़ दिन लग गए। इसके बाद प्रतिमा के निचले हिस्से पादपीठ को उस सॉकेट में एपॉक्सी रेजिन की सहायता से स्थायी रूप से जोड़ दिया गया ताकि भविष्य में फिर कोई उसे दुबारा हानि न पहुंचा सके। जोड़ने के बाद मूर्ति पर सूंड़ अधूरी 2 फरवरी 2017 को जब मूर्ति अपने स्थान पर पुनः स्थापित हुई। लेकिन उसकी सूंड का अग्रभाग कहीं नहीं मिला। पुरातत्व के नियमों के अनुसार प्राचीन शिल्पाकृति में नया हिस्सा जोड़ना उचित नहीं था इससे उसकी प्राचीनता खंडित होती। मैंने खुद कहा-‘यह अधूरी सूंड़ रहेगी, जो याद दिलाती रहेगी कि कभी इस आस्था को तोड़ने की कोशिश हुई थी।’ उस दिन गांव में उत्सव था। पंडित बुलाए गए। पूजा हुई। कलेक्टर ने इसे ‘स्मृति दिवस’ घोषित किया। आज भी इस दिन पर मड़ई का आयोजन होता है। पुलिस अधिकारी भी बने कलाकार, गांव भी जुटा
प्रतिमा को जोड़ने के बाद भी उसके कई हिस्से जैसे मुकुट, यज्ञोपवीत, पैरों के अंगूठे और उंगलियां अधूरे रह गए थे क्योंकि वे हिस्से चूर-चूर हो गए थे। प्रतिमा पर धारदार हथियार से वार करने के निशान और गढ्ढे दिख रहे थे। इस कमी को पूरा करने का जिम्मा पुलिस अधिकारी अनंत प्रधान ने संभाला। काष्ठ की मूर्तियां बनाने में उनकी व्यक्तिगत रुचि उस दिन काम आई। इसलिए उन्होंने सिर के मुकुट से लेकर पैरों के नाखून तक बारीकी से नक्काशी की फिनिशिंग कर दी। पहले और अब की प्रतिमा को देखकर दोनों में अंतर कर पाना आज भी कठिन को है।

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