करंट से 2 मासूमों की मौत पर हाई कोर्ट सख्त:छुट्टी के दिन की सुनवाई कर कहा- ऐसी घटनाएं रोकने रोडमैप बनाएं

गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के करगीकला गांव में 6 साल के बच्चे की खेत के पास खेलते हुए करंट की चपेट में आ गया, जिससे उसकी मौत हो गई थी। वहीं, कोंडागांव जिले में ढाई साल की बच्ची महेश्वरी यादव खुले बिजली के तार की चपेट में आने जान चली गई। इन दो दर्दनाक घटनाओं को हाई कोर्ट ने बेहद गंभीर मानते हुए शनिवार को छुट्टी के दिन सुनवाई की। नेशनल लोक अदालत की व्यवस्तता के बावजूद चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने दोनों घटनाओं को गंभीर लापरवाही मानते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। हाई कोर्ट के संज्ञान लेकर सुनवाई करने के बाद महाधिवक्ता प्रफुल्ल एन भारत ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर मामले की जानकारी दी। इसके कुछ घंटों के बाद ही महिला एवं बाल विकास विभाग के संचालक पदुम सिंह एल्मा ने सभी जिलों के कलेक्टर और महिला बाल विकास अधिकारियों को चिट्ठी लिखी। संचालक ने प्रदेश के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों का निरीक्षण कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए। मुख्य सचिव को व्यक्तिगत शपथ पत्र देने के आदेश दिए। कहा कि केवल कर्मचारियों को निलंबित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ठोस नीति बनाई जाए। साथ ही यह भी बताने को कहा कि मृत बच्चों के परिजनों को अब तक क्या मुआवजा दिया गया है। अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। सीजे सिन्हा की बेंच ने शनिवार को सुनवाई के दौरान कहा कि आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों की सुरक्षा और पोषण के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन वहां ही बच्चों की जान जाना बेहद शर्मनाक है। कोर्ट ने कहा कि राज्य में खेतों में बाड़ पर बिजली का करंट छोड़ने की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं, जिससे न केवल इंसानों बल्कि पशु और वन्यजीवों की भी मौतें हो रही हैं। बरसात के मौसम में यह और भी खतरनाक हो जाता है, क्योंकि पानी भरने से पूरा इलाका करंट की चपेट में आ सकता है। विभाग के संचालक ने सभी डीपीओ से मांगी रिपोर्ट, कहा- सुरक्षा सुनिश्चित करें इधर, हाई कोर्ट के संज्ञान लेकर सुनवाई करने के बाद महाधिवक्ता प्रफुल्ल एन भारत ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर मामले की जानकारी दी। इसके कुछ घंटों के बाद ही महिला एवं बाल विकास विभाग के संचालक पदुम सिंह एल्मा ने सभी जिलों के कलेक्टर और महिला बाल विकास अधिकारियों को चिट्ठी लिखी। संचालक ने ऐसी घटनाओं पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि आंगनबाड़ी केन्द्रों में 3 से 6 वर्ष तक के छोटे बच्चे रोजाना आते हैं। माता-पिता उन्हें सुरक्षित मानकर भेजते हैं, लेकिन इस तरह की लापरवाही बच्चों की जान पर भारी पड़ सकती है। इसलिए विभागीय अधिकारियों, कार्यकर्ता, सहायिका, पर्यवेक्षक, परियोजना अधिकारी और जिला कार्यक्रम अधिकारी का यह दायित्व है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में सभी केंद्रों का गहन निरीक्षण करें और सुरक्षा की पूरी गारंटी दें।

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