ये कैसी इमरजेंसी…:दिल्ली, भोपाल, रांची, कोलकाता से दवाओं की लोकल खरीदी, इससे 412 करोड़ का हेरफेर

छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पताल स्वास्थ्य केंद्रों में अलग ही खेल चल रहा है। दरअसल, प्रदेश में दवा की कमी होने पर इमरजेंसी में स्थानीय खरीदी का प्रावधान है, जिससे मरीज के इलाज में कोई भी बाधा न हो। नियम ये भी है कि स्थानीय खरीदी आसपास के दायरे में होनी चाहिए। एक वित्त वर्ष में केंद्रीकृत खरीद के लिए 90 प्रतिशत और स्थानीय खरीद के लिए 10 प्रतिशत का नियम है। लोकल पर्चेस की इसी विंडो का लाभ लेकर बड़ी हेरफेर भी हो रही है। भास्कर इन्वेस्टिगेशन टीम ने बीते 8 साल के लोकल खरीदी के दस्तावेजों को जब डीकोड किया तो ये खुलासा हुआ। पड़ताल में पता चला कि विभिन्न जिलों के सीएचएमओ, सिविल सर्जन, अस्पताल प्रभारी आदि ने दवा कंज्यूमेबल्स की 8 साल में 1029 करोड़ रुपए से ज्यादा की लोकल खरीद की। यही नहीं जिला अस्पताल, सिविल अस्पताल में कई बार इमरजेंसी में बगैर टेंडर प्रक्रिया के भी दवाओं कंज्यूमेबल्स की खरीदी हुई है। आपात स्थिति बताकर जिन दवाओं की खरीद की गई, वो आसपास के शहरों से नहीं बल्कि सुदूर शहरों से की गई। यहां तक कि दूरदराज के हॉस्पिटल से भी दवाएं खरीद ली गई। जबकि नियमों के अनुसार आपात परिस्थितियों में दवाएं नजदीकी शहरों से ही खरीदना है। दूरदराज के मेडिकल स्टोर्स एजेंसियों से हुई ये खरीदी अपेक्षाकृत अधिक दामों पर हुई। जिससे सरकारी फंड का दुरुपयोग भी हुआ। इस गड़बड़झाले पर सीएजी भी 26 जुलाई 2024 को दी गई आडिट रिपोर्ट में आपत्ति जता चुका है। ये रिपोर्ट वित्तीय वर्ष 2016 से मार्च 2022 के बीच की है। भास्कर इन्वेस्टिगेशन टीम ने इसके आगे के वर्षों की पड़ताल भी है। उसमें भी लोकल पर्चेस की आड़ में बेतहाशा खरीदी का पैटर्न दिखाई देता है। केंद्रीकृत खरीदी के लिए सीजी एमएससी
सरकारी अस्पतालों स्वास्थ्य केंद्रों में दवा कंज्यूमेबल्स उचित दर पर आपूर्ति करने के लिए 2010 में सीजी एमएससी का गठन किया गया। जिसने 2013- 14 से विधिवत संचालन शुरु किया। सीजी एमएससी हर साल औसतन न्यूनतम 100 करोड़ से 300 करोड़ से अधिक की दवा और कंज्यूमेबल्स की आपूर्ति करता है। दवाओं की डिमांड भेजने में हर साल देरी, ताकि लोकल खरीदी का रास्ता बने सीजी एमएससी को दवा कंज्यूमेबल्स उपकरण आदि खरीदने के लिए हर साल अक्टूबर में डीएचएस, डीएमई की ओर से डिमांड भेजी जाती है। प्रशासकीय मंजूरी के बाद खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरु होती है। पड़ताल में पता चला कि हर साल डिमांड भेजने में 2 से 4 महीने या इससे ज्यादा की देर हो रही है। जिससे स्थानीय खरीद का रास्ता खुल रहा है। स्थानीय खरीद सीजी एमएससी के रेट कांट्रेक्ट की तुलना में अधिक दर पर हुई। उदाहरण के तौर पर जिस लिक्विड पैराफिन आईपी को सीजी एमएससी में 69.87 रु में लेता है। उसको स्थानीय स्तर पर 77.87 रु. में लिया गया। इसी तरह 0.95 पैसे में मिलने वाली मिसोप्रोस्टोल टेबलेट की 1.39 रुपए में खरीदी गई। सीएजी ने आडिट रिपोर्ट में बताया कि 2016-17, 17-18, 18-19, 19-20, 20-21, 21-22 जैसे वर्ष में क्रमश: 51,36,42,48,27 और 33 प्रतिशत से अधिक की स्थानीय खरीद हुई। करोड़ों की लोकल खरीद, 250 से ज्यादा मेडिकल स्टोर एजेंसियां, बड़े ऑर्डर दर्जनभर को प्रदेश के जिलों में स्थानीय खरीद के लिए लगभग 250 से अधिक मेडिकल स्टोर्स एजेंसियां इंपैनल हैं। प्रदेश में भंडार क्रय अधिनियम के मुताबिक आपात स्थितियों में लोकल खरीदी का प्रावधान भी है। इसके लिए इंपैनल मेडिकल स्टोर्स, फर्मों से खरीदी की जा सकती है। सामान्य रूप से इसके लिए सीजी एमएससी द्वारा रेट कांट्रेक्ट को आधार बनाकर ही खरीदी करनी है। कई बार इसके लिए टेंडर निकाले जाते हैं। जो अमूमन जेम पोर्टल पर रहते हैं। कई मामलों में टेंडर निकाले बिना ही आपात स्थितियों के मद्देनजर खरीदी कर ली जाती है। ज्यादातर मामलों में सीजी एमएससी के रेट कांट्रेक्ट से अधिक दाम पर स्थानीय खरीद होती है। हमारी टीम ने 8 साल के स्थानीय खरीद के दस्तावेजों की बारीकी से पड़ताल की। पड़ताल में पता चला कि स्थानीय खरीद के बड़े ऑर्डर भोपाल, ग्वालियर, दिल्ली, रांची, कोलकाता, छिंदवाड़ा जैसे शहरों के करीब एक दर्जन से ज्यादा दवा स्टोर और एजेंसियों को दिए गए। 1029 करोड़ की खरीदी में करीब 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अर्थात करीब 411.6 करोड़ रुपए की खरीदी इन्हीं शहरों की है। पड़ताल में पता चला कि दुर्ग, राजनांदगांव, बेमेतरा, बिलासपुर, रायपुर, जांजगीर चांपा, बलरामपुर, गौरेला पेंड्रा मरवाही, रायगढ़, सूरजपुर, सरगुजा जैसे जिलों के सीएमएचओ, जिला व सिविल अस्पतालों ने 2022-23 और 23-24 में जमकर लोकल खरीद की। ये हैं जिम्मेदार: तत्कालीन प्रमुख स्वास्थ्य सचिव, तत्कालीन अतिरिक्त प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, संचालक स्वास्थ्य सेवाएं, कमिश्नर चिकित्सा शिक्षा, संचालक चिकित्सा शिक्षा, संबंधित जिलों के तत्कालीन सीएमएचओ, संबंधित जिला अस्पतालों के सिविल सर्जन, संबंधित सिविल अस्पतालों के अधीक्षक। ^हमारी सरकार के आने के बाद से ही हमने 90 प्रतिशत केंद्रीकृत खरीदी के नियम को सख्ती से लागू किया है। इसलिए आप देखेंगे कि पिछले वर्षों की तुलना में अब लोकल पर्चेस की स्थिति बहुत अधिक कम बन रही है। दवा उपकरण कंज्यूमेबल्स की आपूर्ति के सिस्टम को प्रभावी तरीके से संचालित किया जा रहा है। -श्याम बिहारी जायसवाल, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री

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