न मान्यता, न बैठक और न ही ऑडिट…:फिर भी 17 साल होता रहा एनजीओ को करोड़ों का भुगतान

प्रशांत गुप्ता/ अमिताभ अरुण दुबे की रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े अफसरों ने सबसे बड़ा षड्यंत्र रचते हुए सबसे बड़े घोटाले को अंजाम दिया है। उस समय के एक मंत्री, 2 मुख्य सचिव, 1 अतिरिक्त मुख्य सचिव, 3 सचिव और 2 अन्य अफसरों ने (पद पर रहते हुए) राज्य श्रोत (नि:शक्तजन) संस्थान (एसआरसी) नामक एनजीओ बनाया। रजिस्ट्रार फर्म एंड सोसाइटी में नियम-विरुद्ध पंजीयन करवाया। फिर केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के करोड़ों रुपए इसमें ट्रांसफर करवाते गए। 30 कर्मचारियों को 2-2 जगहों पर पदस्थ दिखाकर 5 सालों तक इनका वेतन (34 लाख रुपए सालाना) निकाला। 2004 में गठित एसआरसी ने 2018 तक कई बड़े कारनामों को अंजाम दिया। भास्कर को पड़ताल के दौरान कई चौंकाने वाले दस्तावेज मिले। इनसे खुलासा हो रहा है कि एसआरसी को समाज कल्याण विभाग से मान्यता ही नहीं थी। एसआरसी की प्रबंध कारिणी की 17 साल में एक बैठक तक नहीं हुई थी न ऑडिट। बावजूद इसके विभाग की शाखाओं से, जिला कार्यालयों से अलग-अलग मदों की बड़ी राशि एसआरसी में ट्रांसफर होती रहीं। अब हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई दोबारा से जांच में जुट गई है। इस आदेश के बाद भास्कर ने पूरे घोटाले को 5 दिनों तक इंवेस्टीगेट किया। दस्तावेज जुटाए। व्हिसल ब्लोअर कुंदन ठाकुर, हाईकोर्ट में वकील देवऋषि ठाकुर और इस दौरान कई ऐसे अफसर संपर्क में आए जिन्होंने ऑफ रिकॉर्ड कई अहम जानकारियां साझा की। शिकायत, प्रारंभिक जांच, कोष लेखा एवं पेंशन संचालनालय की ऑडिट में 31 बिंदुओं में 8.40 करोड़ की बड़ी वित्तीय अनियमितताएं मिली। खुद विभाग ने तमाम शिकायतों, जांचों के बाद 11 सितंबर 2019 में एसआरसी को बंद कर दिया गया। कर्मचारियों का 2-2 जगहों से वेतन निकला अनिरुद्ध का पीआरआरसी में 27945 रुपए प्रतिमाह वेतन निकला और गेट लैब से भी वेतन निकलता रहा। कुंदन ठाकुर को स्वावलंबन केंद्र से ​वेतन मिलता रहा, पीआरआरसी से वेतन निकलता रहा। ऐसे 30 कर्मचारियों का 2014 से 2018 तक 34 लाख रु. वेतन हर साल निकला, जो 1.70 करोड़ रुपए से अधिक होता है। इसमें अन्य नाम स्तुति सिंह, दुष्यंत सिंह, भोजराम, फिजा खान, ईशा ठाकुर का 2-2 जगह से जबकि एस. कुमार, आशीष देव का तीन-तीन जगहों से वेतन निकलता रहा। हमने हाईकोर्ट में सिर्फ 2 जिलों के दस्तावेज पेश किए और ऑडिट रिपोर्ट। मामले की गंभीरता को देखते हुए ही कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए। सोचिए, जब सभी जिलों की जांच होगी तो ​कितना बड़ा मामला फूटेगा। -देवर्षि ठाकुर, हाईकोर्ट में कुंदन का पक्ष रखने वाले वकील पार्ट 2 में – घोटाले में अधिकारी राजेश तिवारी, सतीश पांडेय, अशोक तिवारी, हरमन खलखो, एमएल पांडेय और पंकज वर्मा की क्या भू​मिका थी? अब आगे क्या?- इस मामले में भास्कर ने सीबीआई, याचिकाकर्ता और हाईकोर्ट के वकीलों से बात की। बोले- कांग्रेस सरकार में राज्य में सीबीआई बैन थी,इसलिए जांच नहीं हुई। सीबीआई जांच में बड़े नाम एक्सपोज होंगे। भास्कर ने कुंदन ठाकुर से सिलसिलेवार बात की। बोले- मैं 2008 से 2016 तक मठपुरैना स्वावलंबन केंद्र (पीआरआरसी) में संविदा पर सेवारत था। सब नियमित हो रहे थे तो मैंने भी नियमितीकरण के लिए आवेदन किया। तब मुझे पता चला कि मैं पहले से सहायक ग्रेड-2 के पद पर पदस्थ हूं। मेरे नाम से 2012 से वेतन निकल रहा है। इसके बाद मैंने आरटीआई लगाई और पता चला कि मुझ जैसे रायपुर में 14 और बिलासपुर में 16 कर्मचारी ऐसे हैं, जिन्हें 2 जगहों पर पदस्थ दिखाया गया। मैंने अन्य सभी से बात की, लेकिन किसी ने साथ नहीं दिया। बस यहीं से मेरी जंग शुरू हुई। इसके बाद मुझे नौकरी से निकाल दिया। मैंने हाईकोर्ट में केस किया। कोर्ट ने इसे जनहित याचिका में परिवर्तित करते हुए, 30 जनवरी 2020 को सीबीआई जांच के आदेश दे दिए। फिर बड़े आईएएस अधिकारी सुप्रीम कोर्ट गए, कहा कि उनका पक्ष नहीं सुना गया है। तभी कांग्रेस सरकार ने राज्य में सीबीआई को बैन कर दिया और फिर जांच नहीं हो सकी। लेकिन अब दोबारा हाईकोर्ट ने जांच के आदेश दिए हैं। और इसी दिन मुझे समाज कल्याण विभाग ने दोबारा नौकरी दे दी है। माना में 4 हजार दिव्यांग को कृत्रिम अंग लगाए जाने का दावा भी झूठा है। वहां ऐसा कोई सेटअप ही नहीं था। एक कमरे में एनआरसी का कार्यकाल चल रहा था। यह करोड़ों का दिव्यांग घोटाला है।

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