प्राइमरी में ड्रॉपआउट-5.4% से घटकर 1.8%, सेकेंडरी में भी सुधार:छत्तीसगढ़ में छात्र-शिक्षक रेशियो में सुधार, संविलियन का निर्णय भी असरदार

यूडीआईएसई प्लस रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के स्कूलों में इन दिनों सकारात्मक बदलाव नजर आ रहा है। केंद्र सरकार की यूडीआईएसई (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन) प्लस रिपोर्ट 2023-24 के अनुसार राज्य सरकार ने ड्रॉपआउट रेट कम करने में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। खासकर प्राइमरी और सेकेंडरी कक्षाओं में ड्रॉपआउट रेट काफी सुधरा है। यूडीआईएसई की 2021 की रिपोर्ट ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों की नींद उड़ा दी थी, तब ड्रॉपआउट चिंताजनक रूप से बढ़ा था। मिडिल और हायर सेकेंडरीस्तर की कक्षाओं में काफी छात्र स्कूल छोड़ रहे थे। 2022-23 में जहां प्राइमरी स्तर पर ड्रॉपआउट रेट 5.4 प्रतिशत था, वहीं 2023-24 में यह घटकर मात्र 1.8 प्रतिशत रह गया। अपर प्राइमरी में 6.6 प्रतिशत से घटकर 5.3 प्रतिशत और सेकेंड रीमें 18.2 प्रतिशत से घटकर 16.3 प्रतिशत पर आ गया। यानी बच्चों के स्कूल छोड़ने का सिलसिला लगातार कम हो रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो भारत का औसत प्राइमरी 1.9 प्रतिशत, अपर प्राइमरी 5.2 प्रतिशत और सेकेंडरी14.1 प्रतिशत है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने सख्त निर्णय लेते हुए एकल शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या 80 प्रतिशत तक कम कर दी है। अब अधिकांश स्कूलों में शिक्षक हैं। इसके अलावा राज्य सरकार ने छोटे स्कूलों के संविलियन का निर्णय लेने के साथ तमाम विरोधों के बावजूद अमल किया। इस वजह से अब प्राइमरी स्तर पर पीटीआर यानी छात्र-शिक्षक रेशियो 20 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 29 है। मिडिल स्कूल में प्रदेश का 18 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 38 है। हाई स्कूल में प्रदेश का 16 और राष्ट्रीय 38 है। हायर सेकेंडरी स्कूलों में यह रेशियो छत्तीसगढ़ में 24 है, जबकि राष्ट्रीय 42 है।2019-20 में सेकेंडरी स्कूलों में ड्रॉपआउट 18.25 प्रतिशत था, जो अब घटकर 16.3 प्रतिशत रह गया है। यह गिरावट भले ही धीमी हो, लेकिन दिशा सकारात्मक है। आदिवासी इलाके में खास फोकस वर्ष 2021 के रिपोर्ट में अनुसूचित जनजाति वर्ग के छात्रों का कुल ड्रॉपआउट रेट 20.3 प्रतिशत प्रतिशत था, जो कि राज्य के कुल औसत 18.3 प्रतिशत से भी बहुत अधिक है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने आदिवासी क्षेत्रों में खास फोकस किया। माओवाद प्रभावित इलाकों में बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने के लिए अगस्त 2024 में दंतेवाड़ा से बाल मित्र योजना शुरू की गई। इसमें स्थानीय वॉलंटियर्स घर-घर जाकर ड्रॉपआउट बच्चों को फिर से स्कूल से जोड़ रहे हैं। 10463 स्कूलों के संविलियन का असर: शिक्षा विभाग ने पिछले साल 10463 सरकारी स्कूलों का संविलियन किया। यानी छोटे-छोटे बिखरे स्कूलों को एक ही कैंपस में समाहित कर दिया गया। इस कदम से बच्चों की पढ़ाई निरंतर बनी और शिक्षकों का वितरण भी बेहतर हुआ। अब अधिकांश बच्चों को शिक्षकों का पर्याप्त मार्गदर्शन मिल पा रहा है। कोरोना काल के बाद नई रणनीति से काम: महामारी के समय ड्रॉपआउट बढ़ा था, लेकिन सरकार ने मिड-डे मील, डिजिटल क्लासरूम और स्कूल मैनेजमेंट कमेटियों को सक्रिय किया। गरीबी, पलायन, बाल विवाह और स्कूल की दूरी बच्चों को पढ़ाई से दूर करते हैं। लेकिन राज्य सरकार ने इन चुनौतियों पर काबू पाने की दिशा में पहल की है। एकलव्य स्कूलों में अभी भी स्थिति चिंताजनक: आदिवासी इलाकों में संचालित एकलव्य आदर्श आवासीय स्कूलों में में 2021-22 से 2024-25 तक ड्रॉपआउट पांच गुना बढ़ा है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इसे देखते हुए इन स्कूलों में खास योजनाएं शुरू करने की पहल की गई है। भास्कर एक्सपर्ट – जवाहर सुरी शेट्‌टी, शिक्षाविद् आर्थिक स्थिति सुधरने और योजनाओं का असर दिख रहा वर्ष 2020-21 में कोरोना की वजह से स्कूलों में ड्रॉपआउट रेट बढ़ा था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण छात्रों ने स्कूलों में प्रवेश नहीं लिया था। अब स्थिति वैसी नहीं है। आर्थिक स्थिति सुधरने और सरकार की कई योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन और मॉनिटरिंग से ड्रॉपआउट रेट में तेजी से सुधार हो रहा है। ^हम शिक्षा गुणवत्ता को और बढ़ाएंगे, जिससे बच्चों का स्कूलों की तरफ रुझान बढ़ सके। हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू कर रहे हैं, व्यावसायिक शिक्षा भी इसका एक हिस्सा है। इसका फायदा यह होगा कि जिन बच्चों का पढ़ाई में रुझान कम होता है, वे दूसरी गतिविधियों के माध्यम से स्वावलंबी बनेंगे। इससे या तो बच्चे स्कूल छोड़ेंगे नहीं और जो छोड़ चुके हैं, वे वापस आ जाएंगे। राज्य की पिछली कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर गंभीरता नहीं दिखाई, इसी का नतीजा था कि बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़ देते थे। हमारा प्रयास रहेगा कि आने वाले समय में स्कूल छोड़ने बच्चों की संख्या नहीं के बराबर हो। – गजेंद्र यादव, स्कूली शिक्षा मंत्री

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