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131 जवानों का हत्यारा देवजी नक्सल महासचिव बना:1 करोड़ का इनामी, ताड़मेटला-रानीबोदली अटैक का मास्टरमाइंड, हिड़मा दंडकारण्य संभालेगा, पढ़िए टॉप नक्सल लीडर्स की प्रोफाइल

आंध्रप्रदेश के खूंखार नक्सली बसवाराजू के मारे जाने के बाद नक्सल संगठन ने थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी को नया महासचिव नियुक्त किया है। देवजी बस्तर के 131 से ज्यादा जवानों का हत्यारा है। ताड़मेटला-रानीबोदली अटैक का मास्टरमाइंड है। नक्सल महासचिव ​​​​​देवजी पर 1 करोड़ से ज्यादा का इनाम है। इसके साथ ही PLGA बटालियन कमांडर माड़वी हिड़मा को बस्तर की जिम्मेदारी सौंपी है। हिड़मा को दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का सेक्रेटरी बनाया गया है। माडवी हिड़मा 1996 से नक्सल संगठन से जुड़ा। अब तक कई निर्दोष ग्रामीण और पुलिस जवानों को मार चुका है। थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी की नियुक्ति के बाद अब सुरक्षा एजेंसियां और खुफिया विभाग अलर्ट हो गए हैं। माना जा रहा है कि देवजी की रणनीति से नक्सल संगठन एक बार फिर अपने पैर जमाने की कोशिश करेगा। लाल आतंक को फिर से ग्रामीण इलाकों में खड़ा करेगा। इस रिपोर्ट में पढ़िए कैसे नक्सल संगठन काम करता है? कौन है इसमें प्रमुख लीडर? कितने लाखों-करोड़ों के इनामी नक्सली हैं? सब आपको बताएंगे, कौन हैं देवजी और माड़वी हिड़मा इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में- अब जानिए बस्तर का खूंखार नक्सली माड़वी हिड़मा के बारे में अब पढ़िए कहां और कैसे मारा गया बसवाराजू ? 18 मई, 2025, डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड के जवानों ने नारायणपुर जिले में अबूझमाड़ के जंगलों में तीन तरफ से घुसना शुरू किया। उन्हें एक करोड़ के इनामी नक्सली लीडर बसवाराजू का ठिकाना पता चल गया था। बसवाराजू के साथ उसकी सुरक्षा करने वाली कंपनी नंबर-7 के लोगों ने ही गद्दारी की थी। 40 साल से इन जंगलों में छिपा हुआ बसवाराजू 21 मई को कलेकोट की पहाड़ी पर मारा गया। एनकाउंटर इतना भयकंर था कि एनकाउंटर साइट पर हर तरफ पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। मारे गए नक्सलियों का सामान बिखरा पड़ा था। बसवाराजू का सामान सिक्योरिटी फोर्स साथ ले गई। इसमें एक डायरी भी थी। अफसरों ने दावा किया था कि इसमें बसवाराजू ने साथियों के लिए लिखा- ‘प्रिय कॉमरेड, आप लोग कहीं भी छिप जाओ, DRG फोर्स आप लोगों को खोजकर मारेगी। पढ़ें पूरी खबर… बसवाराजू के साथ मौजूद नक्सली को ट्रैक कर रही थी फोर्स सिक्योरिटी फोर्स के पास इनपुट था कि बसवाराजू गुंडेकोट गांव के पास छिपा है। जवान उसके साथ मौजूद एक नक्सली को एक महीने से ट्रैक कर रहे थे। इसी से बसवाराजू की लोकेशन पता चल गई। उसकी तलाश में शुरू किए ऑपरेशन को ‘अबूझ-723’ नाम दिया गया। DRG की 3 टुकड़ियां बसवाराजू की तलाश में थीं। बसवाराजू की तलाश इसलिए भी मुश्किल थी क्योंकि बसवाराजू सिक्योरिटी फोर्स से सीधे नहीं भिड़ता था। इससे उसकी लोकेशन पता नहीं चलती थी। दूसरी बात कि फोर्स की भनक लगते ही वो जगह बदल लेता था। आखिर 21 मई को तलाश खत्म हुई। सुबह 6:30 बजे घने जंगल से जवानों पर गोलियां बरसने लगीं। इससे उन्हें पता चल गया कि नक्सली कहां छिपे हैं। एक घंटे चली फायरिंग के बाद जंगल में सन्नाटा पसर गया। इसी के साथ 2001 से नक्सलियों की लड़ाकू विंग संभाल रहे बसवाराजू की कहानी खत्म हो गई। कंपनी नंबर-7 के नक्सलियों ने बसवाराजू से की गद्दारी नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई के लिए नारायणपुर में पुलिस ने वॉर रूम बना रखा है। यहां से लगातार सिक्योरिटी फोर्स के ऑपरेशन की मॉनिटरिंग की जा रही है। 12 से 14 घंटे सिर्फ स्ट्रैटजी पर काम होता है। इस ऑपरेशन की सबसे अहम कड़ी खुफिया जानकारी थी, जो बसवाराजू की टीम के अंदर से ही DRG को मिली थी। बीते 6 महीनों में बसवाराजू की सुरक्षा करने वाली पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की सबसे खास ‘कंपनी नंबर 7’ के कुछ लड़ाकों ने सरेंडर किया था। इस कंपनी का काम CPI (माओवादी) के टॉप लीडर यानी महासचिव और सेंट्रल कमेटी सदस्यों की सुरक्षा करना है। बताया जा रहा है कि सरेंडर करने वाले नक्सलियों ने शुरुआत में झूठ बोला कि वे कंपनी-1 से हैं। हमने पहले सरेंडर कर चुके नक्सलियों से उनकी पहचान कराई, तो सच सामने आ गया। लंबी पूछताछ के बाद उन्होंने माना कि वे कंपनी-7 में थे।’ उन्हीं से हमें बसवाराजू की सिक्योरिटी, रहने के तौर-तरीके और उस इलाके की सटीक जानकारी मिली। इस जानकारी के हिसाब से ही हमने पूरी स्ट्रैटजी तैयार की। इसी स्ट्रैटजी से बसवाराजू मारा गया। कैसे काम करता है नक्सली नेटवर्क, कौन-कौन हैं टॉप लीडर्स ? कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के अनुसार सीपीआई (माओवादी) का सर्वोच्च फैसला लेने वाला निकाय पोलित ब्यूरो है। पोलित ब्यूरो में 5 और सेंट्रल कमेटी में 18 नक्सली हैं। महज 2 साल पहले ही बस्तर के माड़वी हिड़मा को सेंट्रल कमेटी में जगह दी गई है। पढ़ें पूरी खबर… नक्सलियों के नेता कैसे चुने जाते हैं? नक्सली भारत सरकार के नक्शे को नहीं मानते। छत्तीसगढ़ का उनका अपना नक्शा है, जिसमें छत्तीसगढ़, तेलंगाना, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और ओडिशा के इलाके आते हैं। इनके हिसाब से चुनाव होता है। कंपनी में अधिवेशन होते हैं। इसमें कंपनी मेंबर चुने जाते हैं। अधिवेशन में सभी प्रतिनिधि आते हैं। इसमें वोटिंग नहीं होती। लीडर एक नाम पुकारता है, जिसके नाम पर सबसे ज्यादा हाथ उठते हैं, उसे मेंबर चुन लिया जाता है। सब मेजॉरिटी से तय होता है। अभी नक्सलियों के सबसे बड़े नेता कौन हैं? सेंट्रल कमेटी और पोलित ब्यूरो सबसे ऊपर हैं। बसवाराजू सेंट्रल कमेटी मेंबर था। सेंट्रल कमेटी में टॉप लीडर होते हैं। सरकार में जैसे कैबिनेट होती है, वैसे पोलित ब्यूरो है। पोलित ब्यूरो में हिड़मा, गणपति, देवजी और सोनू मेरी जानकारी में हैं। इनसे सिर्फ भरोसेमंद लोग ही मिल सकते हैं। हालांकि, ये लोग गांवों में जाते हैं, तब कोई भी उनसे मिल सकता है। डेढ़ साल में मारे गए 400 नक्सली, इनमें बस्तर के ट्राइबल्स ज्यादा तेलंगाना से बस्तर आए नक्सलियों ने यहां के आदिवासियों को हथियार पकड़वाए और खुद के लिए सुरक्षा कवच तैयार किया। अब पुलिस फोर्स के साथ फ्रंट लाइन में बस्तर के ही नक्सली लड़ रहे और मारे जा रहे हैं। तेलुगु कैडर के नक्सली बचकर निकल रहे हैं। हमेशा यह बात उठी है कि बस्तर के नक्सलियों का इस्तेमाल ढाल के रूप में किया जा रहा है। तेलंगाना का कोई ACM, DVCM रैंक का युवा नहीं है जो लड़ाकू हो। या यूं कहें कि वहां फ्रंट लाइन में लड़ने वालों की संख्या लगभग खत्म हो गई है।

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