मैं न सिगरेट पीता हूं न ही शराब…जिम में एक्सरसाइज भी करता हूं, साथ में खाने का भी विशेष ध्यान रखता हूं। फिर मुझे हार्ट अटैक क्यों आया? यह सवाल हमीदिया अस्पताल के आईसीयू में भर्ती 30 साल के राहुल (बदला हुआ नाम) का है। राहुल ने यह सवाल कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय शर्मा से किया है। डॉ. शर्मा के अनुसार यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं, ज्यादातर युवाओं की समस्या बनती जा रही है। इलाज के लिए हमारे पास आने वाले युवा जो मेजर व माइनर मायोकार्डियल इन्फ्रक्शन यानी एमआई (हार्ट अटैक) के कारण आते हैं, उनमें से 72% में यह स्थिति देखने को मिल रही है। इधर, भारत में फार्मास्युटिकल मार्केट का एनालिसिस करने वाली कंपनी एक्युएंट की रिपोर्ट 2025 भी सामने आई है, जिसके अनुसार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हर साल 1286 करोड़ रुपए दिल के मरीजों की दवाओं पर खर्च करने पड़ रहे हैं। यह आंकड़ा देश में 31 हजार करोड़ से अधिक है। ईसीजी-ईको टेस्ट की रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी खतरा
गांधी मेडिकल कॉलेज के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय शर्मा ने कहा कि ह्रदय रोगियों की संख्या बढ़ी है। चिंता की बात यह है कि इनमें एक बड़ी संख्या कम आयु के मरीजों की है। पांच साल पहले की तुलना में वर्तमान में 20 से 40 साल की आयु के पुरुष और महिलाओं में सडन कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक के केस बढ़े हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार, इन पांच साल में अवेयरनेस बढ़ी है। हर आयु के लोग अब नॉर्मल टेस्ट करा रहे हैं, जिनमें इसीजी, ईको कार्डियोग्राम, ट्रेडमिल टेस्ट, लिपिड प्रोफाइल समेत अन्य शामिल हैं। यह टेस्ट यदि नॉर्मल आते हैं तो फिजिशियन बोल देते हैं कि टेस्ट नॉर्मल है। चिंता की कोई बात नहीं है। हम देख रहें हैं कि यह पेशेंट भी सडन कार्डियक अरेस्ट के लिए ससेप्टिबल होते हैं। जो टेस्ट हैं वो आपके दिल में ब्लॉकेज को तब आइडेंटिफाई करते हैं जब उनका स्तर 80 प्रतिशत से अधिक हो। यदि ब्लॉकेज 20 से 30 प्रतिशत हैं तो इन टेस्ट में सब नॉर्मल दिखता है। जबकि यह जो 20 से 30 प्रतिशत के ब्लॉक होते हैं। इन्हें वलनरेबल ब्लॉक कहा जाता है, जिनमें यह ब्लॉकेज हैं, उनमें सडन इमोशनल स्ट्रेस हुआ तो यह अचानक रप्चर कर जाते हैं। जिससे यह आर्टरीज (खून की नस) को ब्लॉक कर देते हैं। जो सडन कार्डियक अरेस्ट या हार्ट अटैक का कारण बनता है। ऐसे करता है इमोशनल स्ट्रेस दिल पर अटैक
डॉ. शर्मा ने कहा, इमोशनल स्ट्रेस आज के टाइम में एक बड़ा रिस्क फैक्टर है। यह फैमिली, वर्क, रिलेशनशिप से जुड़ा हो सकता है। अब ज्यादातर लोग न्यूक्लियर फैमिली में रहते हैं। मोबाइल ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। घर में रहते हुए भी यदि चार लोग हैं तो वो आपस में बात नहीं करते हैं। हर कोई अलग-अलग बैठा रहता है। इन कारणों से स्ट्रेस लेवल बढ़ता है। जो ऐसे हार्मोन बॉडी में रिलीज करता है, जिनसे यह वलनरेबल ब्लॉक रप्चर (फटना) हो जाते हैं, जिससे पूरी नस ब्लॉक होती है और एकदम अच्छा दिखने वाला व्यक्ति अचानक एक क्रिटिकल मरीज की कैटेगरी में आ जाता है। जिसे समय पर इलाज और जरूरी फर्स्ट-एड (सीपीआर) नहीं मिली तो जान बचना मुश्किल हो जाता है। 2 लाख करोड़ से अधिक का हो रहा दवा व्यापार
एक्युएंट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में फार्मास्युटिकल मार्केट सालाना 2 लाख 30 हजार 867 करोड़ रुपए का व्यापार कर रहा है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 10 हजार 767 करोड़ हैं। देश में देखें तो सबसे ज्यादा दिल की बीमारियों की दवा का व्यापार हो रहा है। MP-CG में पेट से जुड़े रोग का व्यापार सबसे बड़ा है। कोविड के बाद से यंग जनरेशन हार्ट पेशेंट
वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. किसलय श्रीवास्तव ने कहा कि कोविड के बाद से यंग पेशेंट में हार्ट से जुड़ी बीमारी बढ़ी हैं। यह पहले भी बढ़ रही थीं, लेकिन अब इनका ग्राफ तेजी से ऊपर गया है। किसी भी प्रकार की कमी हार्ट डिजीज में देखने को नहीं मिली है। इसके साथ-साथ दवाइयों का इस्तेमाल बढ़ा है। इसमें कई फैक्टर जिम्मेदार हैं, जिसमें से प्रमुख दिनचर्या है। जो हमने महसूस किया है कि पहले अपनी डेली लाइफ में काफी एक्टिव थे, लेकिन अब यह कम हो गया है। हार्ट को स्वस्थ रखने के लिए ब्रिस्क वॉकिंग जरूरी
डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, हार्ट मरीजों के लिए सबसे ज्यादा लाभकारी ब्रिस्क वॉकिंग है। लोग क्या करते हैं कि धीमे-धीमे चलते हैं। ऐसे 10 किलोमीटर चलने के बाद भी वो लाभ नहीं दिखते। जो 5 किमी तेज चलने पर नजर आते हैं। हर युवा को दिन में 30 मिनट ब्रिस्क वॉकिंग करनी चाहिए। चेस्ट पेन न लें हल्के में
डॉ. श्रीवास्तव ने कहा, इमोशनल स्ट्रेस एक इम्पॉर्टेंट फैक्टर है। स्ट्रेस की वजह से आर्टरीज पास में चली जाती हैं, जिससे चेस्ट पेन होने लगता है। इमोशन स्ट्रेस के कारण हाइपर टेंशन की समस्या भी बढ़ती है। इस स्थिति में यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से है तो लॉन्ग टर्म में यह बॉडी पर इम्पैक्ट करता है। डॉ. श्रीवास्तव ने आगे कहा कि इन फैक्टर्स के अलावा कई अन्य चुनौतियां भी हैं। उदाहरण के लिए कोलेस्ट्रॉल की जांच में लेवल ठीक आया, लेकिन क्या यह सच में ठीक है। हम अक्सर एलडीएल पैरामीटर पर गौर करते हैं, लेकिन क्या हम जानते हैं कि उसमें भी कई फैक्टर होते हैं। इसमें एक माइक्रो एलडीएल पार्टिकल होते हैं। इसकी समस्या भारत के लोगों में कॉमन हैं। अगर किसी का एलडीएल 100-110 है, लेकिन माइक्रो एलडीएल की हिस्सेदारी उसमें 30 से 40 प्रतिशत है तो यह चिंताजनक स्थिति होती है। इन सब की जानकारी अभी भी लोगों तक नहीं पहुंची है। अब इनको टारगेट करने की भी जरूरत है। कुछ थोड़ी महंगी जांच भी करानी चाहिए, जिसमें होमोसिस्टीन और माइक्रो एलडीएल शामिल है। रोज 144 लोग ह्रदय रोग के चलते एम्बुलेंस से पहुंच रहे अस्पताल
ECG-ईको रिपोर्ट नॉर्मल, फिर भी हार्ट अटैक आया:एमपी-सीजी के 72% युवाओं के दिल इमोशनल स्ट्रेस से कमजोर हुए; दवाओं का सालाना खर्च 1286 करोड़





















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