छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के तखतपुर में 8 महीने पहले एक युवक को कुत्ते ने काट लिया था। लेकिन उसने रेबीज का इंजेक्शन नहीं लगवाया। जिससे उसकी तबीयत बिगड़ गई। रायपुर के मेकाहारा अस्पताल में 2 अगस्त को उसकी मौत हो गई। पेशेंट की पहचान संतोष ध्रुव (38) के तौर पर हुई है। बता दें कि, एक महीने पहले यूपी में भी एक कबड्डी प्लेयर की मौत रेबीज से हुई थी। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मरीज के अस्पताल की छत से कूदकर सुसाइड करने की खबर थी। सैकड़ों सिक्योरिटी गार्डस की तैनाती में मरीज के सुसाइड की खबर से अस्पताल प्रबंधन सवालों के घेरे में आ गया। जिसके बाद हॉस्पिटल ने पूरे मामले पर सफाई देते हुए कहा कि, डेथ इलाज के दौरान हुई है। इस मामले में मरीज को इलाज के लिए मेकाहारा लेकर आए उसके दोस्त ओम प्रकाश निर्मलकर ने बताया कि, परिवार के किसी भी सदस्य या उन्होंने संतोष को कूदते नहीं देखा। सुसाइड की बात से ध्रुव ने भी इनकार किया है। हालांकि मरीज के चिन और कोहनी पर चोट के निशान थे। चोट को लेकर हॉस्पिटल अधीक्षक डॉ संतोष सोनकर ने बताया कि मरीज की स्थिति बेहद खराब थी। वार्ड से सुबह संतोष अचानक भाग गया। गार्डस ने खोजबीन के दौरान उसे कोविड वार्ड के बाहर पाया। सोनकर के मुताबिक, इसी भाग-दौड़ के बीच संतोष को चोट लगी होगी। 8 महीने पहले कुत्ते ने काटा, नहीं लगवाया इंजेक्शन संतोष के दोस्त ओम प्रकाश निर्मलकर ने बताया कि, करीब 8 महीने पहले संतोष मजदूरी कर लौट रहा था। इसी दौरान उसे कुत्ते के एक पिल्ले ने काट लिया। संतोष ने उस समय ध्यान नहीं दिया। 8 महीने तक उसे कुछ हुआ भी नहीं। लेकिन तीन दिन पहले 31 जुलाई को अचानक उसका व्यवहार बदलने का लगा। लार टपकने लगी, वो आउट ऑफ कंट्रोल होने लगा। अब पूरे मामले में अस्पताल प्रबंधन का पक्ष भी विस्तार से जानिए हॉस्पिटल अधीक्षक डॉ सोनकर ने बताया पानी से डर (हाइड्रोफोबिया), चिड़चिड़ापन, हमला करने जैसा व्यवहार दिखने पर 31 जुलाई को संतोष को रेबीज के लक्षणों के साथ अम्बेडकर अस्पताल लाया गया। इलाज के दौरान 2 अगस्त सुबह 7 बजे परिजनों से सूचना मिली कि मरीज अपने आइसोलेशन रूम में नहीं है। नर्सिंग स्टाफ ने तुरंत सुरक्षा गार्डों को मरीज को ढूंढने कहा। आधे घंटे बाद संतोष कोविड वार्ड के पास बैठा मिला। उसके मुंह और चेहरे पर चोट लगने के निशान थे। पैरों में दर्द होने की शिकायत की। मरीज घटना के बाद सामान्य स्थिति में अपने परिजनों से बातचीत कर रहा था। इसके बाद मरीज को वापस आइसोलेशन रूम में लाया गया। इसी दौरान दोपहर 12.30 बजे के आसपास मरीज उसकी मौत हो गई। जून में सर्पदंश के ज्यादा डॉग बाइक की घटनाएं बारिश के मौसम में इस बार सर्पदंश से ज्यादा डॉग बाइट की घटनाएं हुई हैं। रायपुर और बिलासपुर में जून के महीने कुत्ते के हमले का शिकार होकर एंटी रेबीज वैक्सीन लगवाने 558 से ज्यादा लोग अस्पताल पहुंचे हैं। जून महीने में केवल अंबेडकर अस्पताल में 337 लोग पहुंचे हैं। जबकि सर्पदंश के शिकार होने वालों की संख्या महज 41 है। बिलासपुर सिम्स में डॉग बाइट के शिकार होकर वैक्सीन लगवाने आने वालों की संख्या 221 है। इसके अलावा जिला अस्पताल और अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी डॉग बाइट का शिकार होने वाले इलाज के लिए आ रहे हैं। 25 साल बाद भी लौट सकता है वायरस बता दें कि, कुछ दिन पहले यूपी में एक कबड्डी प्लेयर की मौत भी रेबीज से हुई थी। इस केस में भी इंजेक्शन नहीं लगवाया गया था। जिसके चलते प्लेयर की मौत हो गई। तब भी रैबीज से मौत को लेकर काफी चर्चा हुई थी। एक्सपर्ट्स की माने तो रेबीज इतना घातक होता है कि अगर तुरंत इलाज न कराया जाए तो ये अपना असर बाद भी दिखाता है। जिन लोगों में इम्यूनिटी अच्छी होती है, उनमें हो सकता है कि रेबीज का असर तुरंत न दिखे, मगर 25 साल बाद भी इम्यूनिटी कमजोर होते ही ये लौटकर आ सकता है और जान जा सकती है। ऐसा एक उदाहरण 2009 का गोवा में एक मरीज में मिला था। कैसे असर करता है वायरस रेबीज का वायरस संक्रमित पशु की लार में रहता है। जानवर जब किसी को काटता है, तो घाव के जरिए यह वायरस शरीर में पहुंच जाता है। यह सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। फिर उसके जरिए ब्रेन और स्पाइनल कॉर्ड तक पहुंच जाता है। इस दौरान 3 से 12 हफ्ते बीत जाते हैं। कभी-कभी इसमें एक साल या उससे अधिक समय भी लग जाता है। इसे इन्कयूबेशन पीरियड बोलते हैं। इस दौरान किसी तरह के लक्षण नहीं दिखते। लक्षण कितने दिन में दिखेंगे यह वायरल लोड, घाव की जगह जैसी बातों पर निर्भर करता है। ब्रेन में पहुंचते ही ये वायरस तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसके बाद मरीज की हालत बिगड़ जाती है। उसे लकवा मार सकता है, वह कोमा में जा सकता है और आखिर में मौत हो जाती है। रेबीज किन पर करता है हमला यह वायरस सिर्फ मेमल्स यानी स्तनपायी जीवों को ही शिकार बनाता है। स्तनपायी यानी इंसान, कुत्ते, बिल्ली, बंदर, चमगादड़, घोड़े जैसे वे सभी जीव, जिनमें मैमरी ग्लैंड पाई जाती है। जिनके बच्चे मां का दूध पीकर बड़े होते हैं। इसमें जंगली जानवरों के साथ ही पालतू पशु भी शामिल हैं। अगर कुत्ते ने आपको काट लिया है, तो रेबीज से बचने के लिए क्या करें, यह बता रहे हैं एक्सपर्ट… 72 घंटे में एंटी रेबीज इंजेक्शन बेहद जरूरी, वर्ना नहीं होगा दवा का असर किसी अनजान या जंगली जानवर ने आपको काटा हो या खरोंच मारी हो, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं। अगर आपने पालतू कुत्ते, बिल्ली को रेबीज का टीका नहीं लगवाया है और वह काट लेते हैं, तब भी डॉक्टर से मिलें। 72 घंटे के भीतर एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाएं। इससे ज्यादा देरी करने पर दवा का असर नहीं होगा। डॉक्टर सबसे पहले इंसानों या घोड़ों से हासिल की गई रेबीज की एंटी-बॉडीज ‘रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन’ की डोज देते हैं, फिर 4 हफ्ते के कोर्स वाली एंटी रेबीज वैक्सीन दी जाती है। जिसकी 5 डोज होती हैं। इसकी पहली डोज ‘रेबीज इम्यूनोग्लोबलिन’ के ठीक बाद दी जाती है। बाकी डोज तीसरे, 7वें, 14वें और 28वें दिन दी जाती है। बात रेबीज के टीके की हो रही है तो यह भी जानिए कि पहले टीके तक पहुंचने का सफर दुनिया के लिए कैसा रहा… पहले 14 इंजेक्शन लगते थे, अब 5 हो गए, फिर भी जारी है लापरवाही कुछ साल पहले तक रेबीज से बचाव के लिए वैक्सीन की 14 से 16 डोज तक दी जाती थीं। इतने सारे इंजेक्शन लगवाना मरीजों के लिए काफी तकलीफदेह होता था। बाद में विकसित हुई वैक्सीन न सिर्फ ज्यादा सेफ है, बल्कि इसकी सिर्फ 5 डोज लेने की जरूरत ही पड़ती है। हालांकि, कई लोग इसका कोर्स पूरा नहीं करते और सिर्फ 3 डोज ही लेते हैं। कई बार लोगों को सही जानकारी भी नहीं मिल पाती। वहीं, दूसरी तरफ आज भी लोग कुत्ते के काटने से हुए घाव पर लाल मिर्च, गोबर, कॉफी पाउडर जैसी चीजें लगा देते हैं। यह चीजें रेबीज से तो बचाएंगी नहीं, घाव को और घातक जरूर बना सकती हैं। इसलिए ऐसा करने से बचना चाहिए। अगर कुत्ता या कोई दूसरा जानवर काट ले, तो घाव की सफाई के लिए ये तरीके अपनाएं… काटने के बाद ये सबसे महत्त्वपूर्ण बात, जिसे जानना जरूरी जिस कुत्ते, बिल्ली, बंदर या किसी दूसरे जानवर ने आपको काटा है, 10 दिन तक उस पर नजर रखें। अगर वह बीमार दिखे या कुछ दिनों में ही मर जाए तो फौरन अपने डॉक्टर को बताएं। उसमें रेबीज के लक्षण दिखें तो जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग के हवाले कर दें। आंख, नाक, मुंह से भी वायरस जा सकता है अंदर रेबीज का वायरस जानवर के काटने से हुए घाव, पहले से कटी स्किन और नाक, मुंह, आंख की भीतरी झिल्ली (म्यूकस मेम्ब्रेन) के जरिए शरीर में प्रवेश करता है। इसके लिए जरूरी नहीं है कि घाव गहरा ही हो। बहुत हल्की सी खरोंच भी वायरस को बॉडी में पहुंचा देती है। आमतौर पर ऐसी हल्की-फुल्की खरोंच नजरअंदाज कर दी जाती है। इससे वायरस को फैलने का मौका मिल जाता है। अगर संक्रमित जानवर की लार आपके किसी पुराने घाव, खरोंच या म्यूकस मेम्ब्रेन के सीधे संपर्क में आता है, तब उसमें मौजूद वायरस से भी इन्फेक्शन हो सकता है। एक इंसान से दूसरे इंसान को रेबीज का कितना खतरा हवा के जरिए भी रेबीज का वायरस फैल सकता है। अगर हवा में तैरती लार की हल्की बूंदें, जिनमें वायरस मौजूद हो, वह सांस के अंदर जाकर इन्फेक्शन दे सकती हैं। हालांकि, WHO के मुताबिक ऐसा बहुत कम ही होता है। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी रेबीज हो सकता है, लेकिन ऐसा केस देखने को नहीं मिला है।
8 महीने पहले कुत्ते ने काटा…रेबीज-इंजेक्शन नहीं लगवाने से मौत:बिलासपुर के युवक ने मेकाहारा में तोड़ा दम, छत से कूदकर सुसाइड की उड़ी अफवाह

















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