गंदगी के बीच चप्पल-पहनकर बना रहे बताशे, VIDEO:जिस शीट पर उबलती चाशनी, उसी पर चल रहा मजदूर, न कोई साफ कपड़ा;न ढकने का इंतजाम

दिवाली पर्व पर लक्ष्मी माता को बताशे का भोग लगाना बहुत शुभ और लाभदायक माना जाता है। मान्यता है कि इससे देवी प्रसन्न होती हैं और उनकी कृपा परिवार पर बनी रहती है। लेकिन, बिलासपुर में बनने वाले बताशे की न कोई शुद्धता है और न ही सफाई। जिस शीट पर बताशे की टिक्की तैयार किया जा रहा है, उस पर गंदगी के बीच चप्पल पहनकर मजदूर चाशनी गिराते नजर आया। पढ़िए दैनिक भास्कर की ये खास रिपोर्ट… देखिए पहले ये तस्वीरें… पहले जानिए खील-बताशे का पौराणिक महत्व दरअसल, दीपावली पर्व से जुड़ी अनेक मान्यताएं और परंपराएं हैं। ऐसी ही एक परंपरा है दिवाली पूजन में देवी लक्ष्मी को खील-बताशे का भोग लगाना। दिवाली की इस परंपरा के पीछे व्यवहारिक, दार्शनिक और ज्योतिषीय कारण हैं। धन-वैभव का दाता शुक्र ग्रह माना गया है। शुक्र ग्रह का प्रमुख धान्य धान ही होता है। शुक्र को प्रसन्न करने के लिए हम लक्ष्मी को खील-बताशे का प्रसाद चढ़ाते हैं। खील यानी मूलत: धान (चावल) का ही एक रूप है। यह चावल से बनती है और यह प्रमुख अन्न भी है। दीपावली के पहले ही इसकी फसल तैयार होती है, इस कारण लक्ष्मी को फसल के पहले भोग के रूप में खील-बताशे चढ़ाए जाते हैं। बताशे को सुख और प्रेम का प्रतीक माना गया है। इसे मां लक्ष्मी को अर्पित करने से जीवन में सुख, शांति और सौभाग्य बढ़ता है। अब देखिए दुकानों में कैसे बना रहे बताशे दीपावली पर्व पर बताशे की डिमांड बढ़ जाती है। हर चौक-चौराहे पर लाई-बताशे बेचने के लिए छोटे से बड़े व्यापारी दुकान सजाकर बैठे। ऐसे में दैनिक भास्कर ने बताशे बनाने वाले दुकानों का जायजा लिया। यहां जिस तरह से बताशे बनाए जा रहे हैं, उसे देखकर लोग मां लक्ष्मी में प्रसाद लगाना तो खुद खाना पसंद नहीं करेंगे। जिस जगह पर बताशे बनाए जा रहे हैं, वहां न तो कोई साफ-सफाई है और न ही ढंकने के लिए बर्तन। बताशा बनाने वाले हलवाई और मजदूर चप्पल पहन उसी जगह पर आना-जाना कर रहे हैं, जहां बताशा बनाने के लिए चाशनी गिराई जा रही है। चाशनी उबालने वाला गंजा और बर्तन भी साफ नहीं है। जिस शीट पर टिक्की, उस पर चप्पल पहनकर चल रहा मजदूर बताशा बनाने के लिए न तो कोई साफ जगह किचन है और न ही रखरखाव में साफ-सफाई का ध्यान। जहां मजदूर बताशे की टिक्की बनाने के लिए चाशनी गिरा रहा है, वहां खुद चप्पल पहन कर काम रहा है। जिस जगह पर वो चप्पल पहनकर गुजर रहा है, वहीं टिक्की बना रहा है। घर के बाहर गोबर और गंदगी शनिचरी बाजार सहित शहर के कई जगहों पर इस तरह से घरों के बाहर बताशे बनाए जा रहे हैं। बिना सफाई के घरों के बाहर ही बताशे बना रहे हैं। घर से लगी सड़क पर जगह-जगह गोबर बिखरा पड़ा है और उसी के पास बैठकर चाशनी तैयार किया जा रहा है। इस दौरान शक्कर के मिठास की वजह से गोबर और चाशनी के आसपास मक्खियां उड़ती दिख रही है। मक्खियां पहले गोबर और फिर चाशनी तक पहुंच रही हैं। शक्कर को उबालकर बनाए जाते हैं बताशे बताशा बनाने के लिए पानी में शक्कर डालकर उबाला जाता है। शक्कर कड़ाही में सफेद पाउडर की जैसे चिपकने लगती है, तब उसमें बेकिंड सोडा मिलाकर पकाया जाता है। जिसके बाद उसका टिकिया बनाकर सुखाते हैं। सुखी हुई टिकिया को ही बताशे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए मां लक्ष्मी को लगाते हैं बताशे और खील का प्रसाद खील यानी फूला हुआ धान और बताशे यानी चीनी से बने छोटे गोले, दोनों ही समृद्धि और मिठास के प्रतीक हैं। खील को धन और वैभव से जोड़ा गया है, जबकि बताशे को सुख और प्रेम का प्रतीक माना गया है। दिवाली के दिन माता लक्ष्मी को बताशे का भोग लगाना बहुत लाभदायक माना जाता है। इससे देवी प्रसन्न होती हैं और उनकी कृपा परिवार पर बनी रहती है। दिवाली के दिन-रात में जागरण के समय आप बताशे का भोग लगाकर आप उसे प्रसाद के रूप में बांट सकते हैं। साथ ही, इसका संबंध चंद्रमा से होता है। इसके अलावा बताशे का इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों में भी किया जाता है। न बनाने वाले को परवाह और न जिम्मेदारों की है नजर वैसे तो पर्व के दौरान धार्मिक उपयोग में आने वाले खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और शुद्धता के साथ ही सही रखरखाव की जिम्मेदारी व्यापारी को होनी चाहिए। लेकिन, व्यावसायिकता के इस दौर में इसका ख्याल गिने-चुने कारोबारी ही करते हैं। ऐसे में खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और उसकी जांच के लिए जिला प्रशासन के खाद्य सुरक्षा विभाग को निगरानी करना है। लेकिन, जिले के खाद्य सुरक्षा विभाग के अफसर केवल ऑफिस में बैठकर विभागीय काम-काज कर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। विभाग के अफसर न तो कभी ऐसी जगहों की जांच करने जाते हैं और न ही गुणवत्ता परखने के लिए सैंपल लेते हैं। दीपावली पर्व पर कुछ होटल और मिठाई दुकान में जाकर मिठाइयों का सैंपल लेकर अफसरों ने जांच के लिए भेजा है। लेकिन, जहां इसे बनाया जाता है, वहां झांकने तक नहीं जाते। ………………………………… यह खबर भी पढ़ें… बिलासपुर में केमिकल से बन रहा नकली दूध, पनीर: होटलों-रेस्टोरेंट्स में सप्लाई, 200 रुपए किलो में बिक रहा; लीवर को कर सकता है डैमेज छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में मिलावटी पनीर का धंधा बड़े पैमाने पर फैल चुका है। शहर की कई छोटी फैक्ट्रियों और दूध यूनिट्स में स्किम्ड मिल्क पाउडर से पनीर तैयार किया जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि तेल, यूरिया, कास्टिक सोडा और चीनी मिलाकर नकली दूध बनाया जा रहा है। शहर के कई होटल-रेस्टोरेंट्स में इसकी सप्लाई हो रही है। पढ़ें पूरी खबर…

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