बाढ़ में टूटा पुल, राशन बहा, सोना-चांदी दबा:दंतेवाड़ा में मुआवजे से नाराज लोग बोले- 10 हजार में मकान नहीं बनता, गांव छोड़ देंगे

तारीख 26 अगस्त, 2025 दिन…मंगलवार यही वो दिन था, जब छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का दंतेवाड़ा जिला बाढ़ की चपेट में आया। शहर और गांव पानी में डूब गए, पुल टूट गए, पूरे घर और सालों की मेहनत का सामान बह गया। जहां कभी हरी-भरी फसलें लहलहा रही थीं, वो खेत अब नदी की रेत में दबे हुए हैं। बाढ़ का पानी उतर चुका है, लेकिन लोगों का दर्द अभी भी ताजा है। जिन गांवों में पीढ़ियां गुजरी थीं, वहां अब सिर्फ टूटी दीवारें और गिरी छतें बची हैं। बाढ़ ने यहां के लोगों की जिंदगी की तस्वीर ही बदल दी है। कई परिवारों का कहना है कि अब वे इस गांव में नहीं रहेंगे। दैनिक भास्कर की टीम ने बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित बालपेट और भैरमबंद गांव का दौरा किया और वहां के लोगों से बातचीत की। बाढ़ के बाद अब वहां के हालात कैसे हैं लोगों को अब कौन सी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इस ग्राउंड रिपोर्ट में विस्तार से पढ़िए:- बाढ़ के बाद की ये तस्वीरें देखिए- घर में अब सिर्फ मिट्टी और मलबा बचा है दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर दूर बसे गांव बालपेट गांव की आबादी लगभग 1700 है। यहां बाढ़ से करीब 174 घर गिर चुके हैं। बालपेट गांव पहुंचने पर कई घर पूरी तरह जमींदोज मिले। इन्हीं खंडहरों के बीच मिट्टी हटाते हुए कुंती नाग दिखाई दीं। हल्बी भाषा में उन्होंने अपना दर्द सुनाया “ये घर मेरे सास-ससुर ने बनाया था। ब्याहकर आई तो यहीं बसी। हमने अपनी बचत से पलंग, कपड़े, सोना-चांदी तक खरीदा था। सब बाढ़ में बह गया। घर में रखे पैसे तक मिट्टी में दब गए। अब उम्मीद यही है कि कुछ बचा-खुचा मिल जाए। इसलिए मिट्टी हटाकर ढूंढ रही हूं।” कुंती बताती हैं कि धान-चावल-दाल सब बह गया। सरकार से मुआवजे की बात तो हुई है, लेकिन अब तक रकम हाथ में नहीं आई। अभी वे पंचायत भवन के पास बने शेड में रह रही हैं और स्कूल से मिलने वाले खाने पर गुजारा कर रही हैं। सरकार ने कहा मुआवजा मिलेगा, लेकिन हाथ में कब आएगा? कुंती के घर से कुछ दूर एक आधा ढहा हुआ घर खड़ा था। दीवारें झुकी हुई थीं और ऐसा लग रहा था कि कभी भी पूरी तरह गिर सकता है। यहां फूलमती बीना कुछ कहे अपने टूटे घर के सामने खड़ी हो गई। हमें देखकर उन्हें लगा कि मुआवजा सर्वे करने वाली टीम आई है। जब पूछा कि कितना नुकसान हुआ, तो गुस्से से बोलीं “देख तो रहे हो… घर गिर गया है। धान-चावल सब बह गया। फसल भी तबाह हो गई। सरपंच कह रहे हैं कि मुआवजा मिलेगा, लेकिन कब और कितना, ये तो तभी पता चलेगा जब हाथ में पैसा आएगा।” फूलमती डरी हुई हैं। उनका कहना है कि अब बाढ़ ने यहां नया रास्ता बना लिया है। “अगली बार फिर से पानी आया तो सबकुछ बह जाएगा। यहां रहना अब सुरक्षित नहीं है।” हर साल बाढ़ आई तो बार-बार घर कैसे बनाएंगे? इसी गांव की लक्ष्मी नाग बताती हैं “हमारा पूरा गांव डूब गया था। कई घर पूरी तरह से गिर गए और जो बचे हैं, वो भी गिरने की हालत में हैं। कई परिवार रात में हाईस्कूल में जाकर सोते हैं। हम इस घर में रहकर डरते हैं।” 1.20 लाख मिला, लेकिन 4 लाख का सामान बह गया बालपेट गांव के छोर पर हरेन्द्र नाग का घर था, जो अब पूरी तरह ढह चुका है। हरेन्द्र मलबे में दबे सामान को निकालने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने बताया कि“सरकार से हमें 1 लाख 20 हजार रुपए का मुआवजा मिला है। पढ़ाई भी बंद हो गई, किताबें बह गईं बाढ़ का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ा है। गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाले तरुण नाग ने बताया “बाढ़ आने के बाद से स्कूल बंद है। कई स्कूलों को भारी नुकसान पहुंचा है। मुआवजा राशि को लेकर लोगों में गुस्सा गांव की सरपंच अकलबती नाग का कहना है कि राहत सामग्री में खाने-पीने की कोई कमी नहीं है। प्रशासन से सब कुछ मिल रहा है, लेकिन दिक्कत मुआवजा को लेकर है। अकलबती बोलीं जिनके घर पूरी तरह गिर गए, उन्हें 1 लाख 20 हजार रुपए मिले हैं। लेकिन कई ऐसे परिवार भी हैं, जिनके घर रहने लायक नहीं बचे, दरारें आ गईं, फिर भी उन्हें ‘आंशिक क्षति’ मानकर सिर्फ 10 हजार रुपए दिए गए। यही सबसे बड़ी नाराजगी है। भैरमबंद गांव: 400 की आबादी, सबके घर प्रभावित बालपेट के बाद टीम भैरमबंद गांव पहुंची। करीब 400 आबादी वाला यह गांव भी पूरी तरह बाढ़ से प्रभावित हुआ है। हर घर किसी न किसी तरह से क्षतिग्रस्त है और लोग फिलहाल रीपा सेंटर में बने राहत शिविर में रह रहे हैं। यहीं राहत शिविर में मुलाकात हुई यशवंत सिंह ठाकुर से। वे हमें अपना ढहा हुआ मकान दिखाने ले गए। उनका घर डंकिनी नदी के किनारे बना था। यशवंत ने बताया “दोपहर करीब 2 बजे घर में पानी भरना शुरू हुआ। उसी समय जिला प्रशासन की रेस्क्यू टीम पहुंची। मेरी पत्नी और बच्चे घर छोड़ने को तैयार नहीं थे, लेकिन कलेक्टर और CMO के कहने पर हम बाहर निकले। गांव के ही भूतेन्द्र सिंह ठाकुर का कहना है पहले भी कई बार बारिश में नाले और नदी उफान पर आते थे, लेकिन इस बार का मंजर सबसे खतरनाक था। राहत शिविर में एक दूसरे का सहारा बने लोग भैरमबंद गांव के लोग फिलहाल रीपा सेंटर में बने राहत शिविर में रह रहे हैं। यहां मुश्किल हालात में महिलाएं एक-दूसरे का सहारा बनी हुई हैं। महिलाएं मिलकर खाना बनाती हैं और फिर आपस में एक-दूसरे को परोसती हैं। इसी तरह चंद्रकला और लक्ष्मी ठाकुर का कहना है “हम एक दूसरे की मदद करते हुए यहां ठहरे हुए है। राहत शिविर में राशन के अलावा महिलाओं और बच्चों को पहनने के लिए कपड़े दिए गए। यहां तक की अंडरगारमेंट्स और सेनेटरी पैड भी बांटे गए। राहत शिविर में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन चिंता आगे की है। आखिर कब तक यहां रहेंगे और कब अपना घर दोबारा बस पाएंगे?” बिंजाम गांव: पेड़ पर बितानी पड़ी रात भैरमबंद के बाद टीम बिंजाम गांव पहुंची। यहां भी बाढ़ ने बड़ा नुकसान किया है। प्राथमिक शाला के पास बने शेड में कई परिवार एक साथ रह रहे थे। जिनका सामान बाढ़ में बह गया था, उन्हें यहां बर्तन बांटे जा रहे थे। शिविर में मौजूद जनपद उपाध्यक्ष दिनेश कुशवाह ने बताया “सरकार की तरफ से सभी जनप्रतिनिधियों को निर्देश दिए गए हैं कि बाढ़ प्रभावित गांवों का दौरा करें और पीड़ितों के लिए राहत सामग्री की व्यवस्था करें। इसी वजह से हम गांवों में पहुंचकर जरूरी बर्तन और अन्य सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं।” राहत शिविर में बर्तन ले रही मुन्नी भास्कर ने अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा “हमारा घर नदी के करीब था। बाढ़ वाले दिन शाम 6 बजे पूरा परिवार पेड़ पर चढ़ गया। पूरी रात पेड़ पर गुजारी और पानी कम होने पर सुबह 5 बजे नीचे उतरे। तब तक घर पूरी तरह से तबाह हो चुका था।” इसी तरह आगे हम सियानार और समलूर भी गए। यहां छविन्द्र ठाकुर हमें मिले। छविन्द्र ने बताया कि बाढ़ वाले दिन वह केवल अपने बच्चों की मार्कशीट और कुछ जरूरी डॉक्यूमेंट ही बचा पाए। बाकी सब तो पानी में बह गया। हालांकि, छविन्द्र का कहना है कि जब कलेक्टर गांव का दौरा करने आए थे तब उन्होंने भरोसा दिया था कि विधवा भाभी को भी जल्द मुआवजा मिलेगा। पुल टूटने से स्कूल जाने वाले बच्चों को भी दिक्कत दंतेवाड़ा बायपास रोड पर चितालंका के पास डंकिनी नदी पर बना पुल बाढ़ का दबाव झेल नहीं सका। करीब दो दशक पहले बना यह 100 मीटर लंबा पुल पूरी तरह ढह गया। स्लैब और पिलर तक का नामोनिशान मिट चुका है। फिल्टर प्लांट का पंप हाउस और रिटेनिंग वॉल भी टूट-फूट गए हैं। जिला प्रशासन के मुताबिक अब तक जिले में कुल 26 सड़क और पुल-पुलियां टूट चुके हैं। इस आपदा में 56 करोड़ रुपए से ज्यादा के इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान हुआ है। कलेक्टर कुणाल दुदावत ने बताया कि सभी क्षतिग्रस्त संरचनाओं के लिए टेंडर जारी कर फिर से काम शुरू कराया जा रहा है। इमरजेंसी रिपेयर का काम फिलहाल पूरा कर लिया गया है। सबसे ज्यादा परेशानी गांव के बच्चों को हो रही है। कोरकोटी स्कूल में पढ़ने वाले रेका गांव के बच्चे रोजाना दो किलोमीटर पैदल चलकर बारसूर-चित्रकोट मार्ग पर बने पुल से गुजरते थे। लेकिन बाढ़ में पुल का एक छोर बह जाने से आवाजाही ठप हो गई। अब ग्रामीणों ने लकड़ी की बल्लियां और तार का सहारा लेकर अस्थायी रास्ता तैयार किया है। इसी टूटे पुल से रेका गांव के 20 से ज्यादा बच्चे रोज स्कूल पहुंच रहे हैं। तकनीकी दिक्कतों की वजह से अटका मुआवजा दंतेवाड़ा कलेक्टर कुणाल दुदावत ने बताया कि 26 अगस्त की रात भारी बारिश की वजह से दंतेवाड़ा जिले के 27 गांव प्रभावित हुए थे। तब 1100 लोगों को बाढ़ से रेस्क्यू कर निकाला गया था। उन्होंने बताया कि मुआवजा वितरण के दौरान कुछ तकनीकी दिक्कतें सामने आई हैं। करीब 50 से 60 परिवार ऐसे हैं, जिनका बैंक अकाउंट सही से लिंक न होने या अन्य कारणों से भुगतान अटका हुआ है। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि या तो इन खातों की तकनीकी समस्या दूर की जाएगी या फिर जरूरत पड़ने पर नए अकाउंट खुलवाकर मुआवजा दिया जाएगा। सिर्फ इतना ही नहीं, जिनके घर आंशिक रूप से टूटे हैं, उन्हें भी मदद दी गई है। 602 परिवारों को 10-10 हजार रुपए दिए गए हैं। इसके अलावा जिनके पशु मरे हैं, उन्हें भी नुकसान की भरपाई के लिए 7 लाख 39 हजार 800 रुपए दिए गए हैं। फिलहाल जिले में 12 राहत शिविर चल रहे हैं, जहां 506 लोग रह रहे हैं। इन शिविरों समेत कुल 560 लोगों को रोज खाना खिलाया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है और कोशिश यही है कि कोई भी परिवार राहत से वंचित न रह जाए। लोगों की मदद के लिए एक कंट्रोल रूम भी बनाया गया है। जरूरत पड़ने पर कोई भी व्यक्ति 07856-252412 नंबर पर कॉल कर सकता है। बारिश, बाढ़ के बाद की ये तस्वीरें भी देखिए-

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