छत्तीसगढ़ को राज्य बने आज 25 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन उस रात की कुछ झलकियां आज भी उतनी ही जिंदा हैं। घड़ी में जैसे ही 12 बजे और तारीख ने 1 नवंबर 2000 का रूप लिया, भारत के नक्शे पर छत्तीसगढ़ एक नया राज्य बनाकर उभरा। दिल्ली के गलियारों में फैसलों का दौर चल रहा था, तो रायपुर में मंच तैयार हो रहा था। झंडे लहरा रहे थे। बैंड बज रहा था और प्रशासनिक इतिहास का नया अध्याय लिखा जा रहा था। राज्य गठन का ऐलान, शपथ ग्रहण और पहले मुख्यमंत्री की घोषणा। इन तीनों के बीच कई अनकही कहानियां छिपी हैं। रायपुर पुलिस ग्राउंड में रात के सन्नाटे को तोड़ती तालियों की गूंज थी। मंच पर अजीत जोगी खड़े थे, लेकिन यह कहानी सिर्फ एक रात की नहीं थी। यह उन महीनों की दास्तान थी जब दिल्ली में सोनिया गांधी के दो शब्द ‘Get Ready’ ने सब कुछ बदल दिया था। कहते हैं, जोगी को खुद भी अंदाजा नहीं था कि शहडोल की हार एक दिन उन्हें इतिहास के पन्नों में दर्ज कर देगी। कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी, शुक्ल परिवार की सियासत, दिग्विजय सिंह की चुप्पी और नीतीश कुमार की टाइमिंग ने मिलकर छत्तीसगढ़ के के पहले मुख्यमंत्री की कहानी गढ़ दी थी। शपथ ग्रहण की रात राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय जब अजीत जोगी को शपथ दिला रहे थे, उस वक्त मंच से दूर रेणु जोगी खड़ीं थीं, जिन्हें बिना पास के शपथ ग्रहण समारोह में जाने से रोक दिया गया था, फिर भी उनकी आंखों में वह चमक थी, जो इतिहास बनते हुए देखने वालों की आंखों में होती है। 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ का जन्म सिर्फ एक राज्य की शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक सपने के साकार होने की कहानी थी। मुख्यमंत्री बनते ही जोगी ने बिजली बेचकर राज्य की अर्थव्यवस्था को रफ्तार दी। जोगी ने MP के CM रहे दिग्विजय सिंह को कह दिया था कि आज नगद कल उधार। इस रिपोर्ट में पढ़िए छत्तीसगढ़ के जन्म की वो 8 अनसुनी कहानियां, जिनमें है दिल्ली की स्क्रिप्ट, दिग्विजय का फटा कुर्ता, कांग्रेस में बगावत, शपथ ग्रहण में रेणु जोगी को रोकना और छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए पॉलिटिकल संग्राम ? पहली कहानी- चुनाव हारे, लेकिन सोनिया गांधी से मिले CM के संकेत कहानी 1999 की है। शहडोल लोकसभा सीट से अजीत जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी थे। कई महीनों तक जमीन पर पसीना बहाने के बाद नतीजे आए। जोगी करीब 20 हजार वोटों से हार गए। कांग्रेस दफ्तर में सन्नाटा था। कई कार्यकर्ता बाहर फूट-फूटकर रो रहे थे। जोगी शांत थे। इस दौरान जोगी बाहर आकर बस इतना कहा कि दौड़ अभी खत्म नहीं हुई है, क्योंकि मैं जीता नहीं हूं। हर बुराई में कोई न कोई अच्छाई छिपी होती है। उन्हें खुद भी उस वक्त क्या मालूम था कि यही हार, कुछ महीनों बाद, उन्हें इतिहास का हिस्सा बना देगी। कहा जाता है कि अगर अजीत जोगी शहडोल लोकसभा चुनाव जीतकर वह सांसद बन जाते, तो साल 2000 में बने नए राज्य छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री वे कभी नहीं बन पाते। कहा जाता है कि उन पर बाहरी सांसद होने का ठप्पा लग जाता, ऐसे में CM की कुर्सी उनके लिए चुनौती बन जाती। सोनिया गांधी का सवाल, जिसने बदल दिया इतिहास लोकसभा हारने के बाद अजीत जोगी ने कभी हार नहीं मानी। वो न तो कभी मंत्री रहे, न विधायक, न सांसद लेकिन कांग्रेस में उनकी पहचान थी “संगठन और दिमाग से मजबूत नेता” की। सोनिया गांधी उस वक्त कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष थीं (1998–2017)। जोगी तब पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे। रोजाना मीडिया ब्रीफिंग, दिल्ली प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोनिया गांधी से लगातार मुलाकातें। एक दिन ऐसी ही ब्रीफिंग के दौरान सोनिया गांधी उनकी बात ध्यान से सुन रही थीं। जोगी बोल रहे थे, और वो बस मुस्कुरा रहीं थीं। ब्रीफिंग खत्म होने के बाद उन्होंने अचानक अंग्रेजी में पूछा-“How long do you wish to continue doing this job?” यानि तुम कब तक प्रवक्ता का काम करना चाहते हो?” जोगी के लिए ये वाक्य किसी बिजली की तरह गिरा। उन्हें लगा कि शायद उन्होंने कोई गलती कर दी है,या शायद सोनिया उन्हें प्रवक्ता पद से हटाना चाहती हैं। उन्होंने थोड़ा झिझकते हुए जवाब दिया। मैडम, मैं बहुत मेहनत से ये काम कर रहा हूं और मुझे इसमें आनंद आता है… लेकिन जैसा आप चाहें। वो दो शब्द- गेट रेडी, इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए सोनिया गांधी ने कुछ पल तक उन्हें देखा, फिर शांत लहजे में बोलीं तुम्हें पता नहीं है? छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण की घोषणा हो चुकी है… तैयार रहो।” वो दो शब्द- गेट रेडी..इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए। सोनिया गांधी ने भले ही मुख्यमंत्री पद का नाम नहीं लिया, लेकिन जोगी समझ गए कि सोनिया गांधी ने इशारा कर दिया है। वो छत्तीसगढ़ भेजे जाएंगे, और शायद मुख्यमंत्री के रूप में। उन्होंने मुस्कुराते हुए थैंक यू कहा और बाहर जाने लगे, तभी सोनिया गांधी ने उन्हें वापस बुलाया और कहा इस बात की चर्चा किसी से मत करना… यहां तक कि अपनी पत्नी रेणु से भी नहीं। जोगी ने सिर झुकाकर यस मैम कहा और बाहर निकल आए। इसके बाद कई दिनों तक उन्होंने उस विषय पर किसी से बात नहीं की। वो पल शायद उनके जीवन का सबसे शांत और साथ ही सबसे तूफानी पल था। उस दिन पहली बार किसी ने दिल्ली से रायपुर तक अजीत जोगी का नाम “छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री” के रूप में लिखा था। दूसरी कहानी- दिल्ली के 10 जनपथ में था नेताओं का डेरा राज्य निर्माण की घोषणा के साथ ही दिल्ली में छत्तीसगढ़ के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बड़ी भीड़ जमा हो चुकी थी। हर कोई अपने-अपने नेता के पक्ष में पैरवी करने में जुटा था। किसी का डेरा 10 जनपथ के बाहर, तो कोई पार्टी ऑफिस में कैंप लगाए बैठा था। स्वाभाविक तौर पर अजीत जोगी के समर्थक भी जमकर जुटे हुए थे। उनमें सक्ती के राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह, बिलासपुर की महिला नेत्री वाणी राव, और राजनांदगांव के इमरान खान, ये तीनों तो पूरे 30-40 दिन दिल्ली में जमे रहे। सुरेन्द्र सिंह ने माधवराव सिंधिया और अर्जुन सिंह से बार-बार जोगी के पक्ष में बात की। वाणी राव ने दिल्ली की वरिष्ठ महिला नेताओं तक लॉबिंग की।इमरान खान, गुलाम नबी आजाद के लगातार संपर्क में थे,और उन्हें यकीन था कि जोगी ही सही चुनाव हैं। दूसरी ओर बाकी दावेदारों के भी अपने-अपने गुट थे। हर होटल, हर कॉन्फ्रेंस रूम में “कौन बनेगा मुख्यमंत्री” पर चर्चाएं जारी थीं। शुक्ल परिवार बनाम बाकी सब हो गया था राज्य बनने से पहले से ही छत्तीसगढ़ की राजनीति में शुक्ल परिवार का दबदबा था। 1946 में रविशंकर शुक्ल सीपी-बरार के मुख्यमंत्री बने। उनके बाद श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल ने दशकों तक प्रदेश और दिल्ली की राजनीति में वर्चस्व बनाए रखा। इसलिए आम धारणा थी कि विद्याचरण शुक्ल ही छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री होंगे। बाकी दावेदारों में सत्यनारायण शर्मा, राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, अरविंद नेताम, रविन्द्र चौबे, चरणदास महंत, और महेन्द्र कर्मा के नाम भी उभर रहे थे। तीसरी कहानी- आदिवासी CM के लिए विधायक हो गए थे लामबंद उस वक्त राज्य में सबसे बड़ी जनसंख्या आदिवासी वर्ग की थी, इसलिए यह मांग उठी कि पहला मुख्यमंत्री किसी आदिवासी को बनना चाहिए। आदिवासी विधायक लामबंद हो गए। उनके साथ अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग के नेता भी जुड़ गए। सभी ने मिलकर छत्तीसगढ़ की एक बस यात्रा शुरू की – नाम था “आदिवासी एक्सप्रेस।” बस्तर से निकलकर पूरी यात्रा रायपुर तक चली। हर जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस होते, नारे लगते “आदिवासी मुख्यमंत्री बनाओ।”नाम किसी का नहीं लिया जाता था,लेकिन महेन्द्र कर्मा इस यात्रा में सबसे सक्रिय थे और परदे के पीछे अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे थे। अजीत जोगी ने भी महसूस किया कि इस लहर में शामिल होना जरूरी है। उन्होंने भी यात्रा में हिस्सा लिया ताकि माहौल उनके पक्ष में बने। महेन्द्र कर्मा जोगी को सीएम बनाने नहीं हो रहे थे तैयार जो भी कांग्रेस को समझता है, वह ये भी जानता है कि मुख्यमंत्री चयन का अंतिम फैसला दिल्ली में ही होता है। और जोगी के पास सबसे बड़ा हथियार था। सोनिया गांधी का भरोसा। मुख्यमंत्री चयन के लिए सोनिया गांधी ने दो पर्यवेक्षक भेजे। गुलाम नबी आजाद और प्रभा राव। साथ में दिग्विजय सिंह को भी भेजा गया, क्योंकि छत्तीसगढ़ के कई विधायक उनके करीबी थे। सभी विधायक रायपुर के पिकाडिली होटल में ठहरे हुए थे। दिग्विजय सिंह को खुद सोनिया गांधी ने जिम्मेदारी दी थी कि विधायकों को जोगी के पक्ष में तैयार करना है। उन्होंने सबको भरोसे में लिया ज्यादातर मान गए, केवल महेन्द्र कर्मा नहीं मान रहे थे, क्योंकि वे अपने आप को इस पद का प्रबल दावेदार मान रहे थे। फिर पिकाडिली होटल में दिग्विजय ने कर्मा से जोगी की मुलाकात कराई,और फिर जोगी ने कहा कि – वे मुख्यमंत्री बनने के बाद वो उन्हें पर्याप्त महत्व और पूरा सम्मान देंगे।इस बातचीत के बाद माहौल थोड़ा ठंडा पड़ा। चौथी कहानी- विद्याचरण शुक्ल के फॉर्म हाउस में थे कांग्रेसी विधायक छत्तीसगढ़ के पहले CM फेस को लेकर जैसे-जैसे हालात साफ होते गए, विद्याचरण शुक्ल को एहसास हो गया कि मुख्यमंत्री की कुर्सी अब उनकी पहुंच से दूर जा रही है। हार मानना उनके स्वभाव में नहीं था, इसलिए उन्होंने दबाव की राजनीति शुरू कर दी। अपने 7 वफादार विधायकों को उन्होंने रायपुर के बाहर अपने फार्महाउस बुला लिया। उन्हें वहीं रुकने को कहा और दिल्ली में उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क साधा, उम्मीद थी कि अगर भाजपा से समर्थन मिल जाए तो कुछ विधायक कांग्रेस से तोड़कर वो खुद बहुमत जुटा लेंगे, लेकिन किस्मत उनके साथ नहीं थी। 7 से आगे कोई और विधायक उनके पाले में नहीं आया। बाद में कई विधायकों ने बताया कि शुक्ल उन्हें तरह-तरह के लालच दे रहे थे, लेकिन कोई भी खुलकर उनके साथ नहीं गया। उधर, लंबे राजनीतिक वनवास के बाद कांग्रेस में लौटे श्यामाचरण शुक्ल ने हालात को समझदारी से देखा। उन्हें साफ दिख रहा था कि आलाकमान न उन्हें और न ही उनके भाई विद्याचरण शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाने के मूड में हैं, इसलिए उन्होंने चुप रहना ही ठीक समझा। धीरे-धीरे वो खुलकर अजीत जोगी के पक्ष में आ गए। फिर औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई पार्टी पर्यवेक्षकों गुलाम नबी आजाद और प्रभा राव ने सभी विधायकों से अलग-अलग मुलाकात की। रायपुर के पिकाडली होटल में विधायक दल की बैठक बुलाई गई। गिनती पूरी हुई 44 विधायक जोगी के पक्ष में, और केवल 7 शुक्ल के साथ। गुलाम नबी आजाद ने जैसे ही यह ऐलान किया कि अजीत जोगी कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए हैं, पहुंचा विश्राम गृह में जश्न का माहौल बन गया। आतिशबाजी, नारेबाजी, फूलों की माला और जयघोष…. माहौल पूरी तरह जोगी मय हो गया। शुक्ल के फार्म हाउस पर समर्थक हो गए थे बेकाबू अजीत जोगी के नाम की घोषणा के बाद शुक्ल के फार्महाउस ‘राधेश्याम भवन’ पर भीड़ बेकाबू हो गई थी। गुलाम नबी आजाद, प्रभा राव और दिग्विजय सिंह तीनों वहां उन्हें सांत्वना देने पहुंचे। जैसे ही दिग्विजय सिंह कार से उतरे, गुस्साए समर्थक उन पर टूट पड़े। इस दौरान धक्का-मुक्की हुई। अफरा-तफरी मच गई। प्रभा राव ने समझदारी से कार से उतरना ही सही नहीं समझा, जबकि गुलाम नबी आजाद पिछला दरवाजा खोलकर सीधे अंदर पहुंच गए। थोड़ी देर में खुद विद्याचरण शुक्ल बाहर आए और किसी तरह माहौल शांत कराया। उस वक्त दिग्विजय सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उनके साथ पूरा सुरक्षा बल मौजूद था, फिर भी ऐसी घटना हो गई। ये सभी के लिए हैरानी की बात थी। शुक्ल ने बाद में सफाई दी कि जो लोग हमला करने आए थे, वे “असमाजिक तत्व” थे, उनके समर्थक नहीं। वहां जो कुछ हुआ, उतना बड़ा नहीं था जितना बताया जा रहा- दिग्विजय इस दौरान दिग्विजय सिंह ने भी बड़ेपन का परिचय दिया मीडिया से कहा कि वहां जो कुछ हुआ, उतना बड़ा नहीं था जितना बताया जा रहा है। अजीत जोगी के लिए ये घटना निजी तौर पर भी गहरी थी। वे जानते थे कि दिग्विजय सिंह और उनके बीच राजनीतिक खाई बहुत गहरी है। दोनों को आम लोगों के बीच राजनीतिक शत्रु के तौर पर जाना जाता था, लेकिन फिर भी सिंह ने सोनिया गांधी के निर्देश पर एक-एक विधायक से खुद जाकर बात की और जोगी के पक्ष में माहौल बनाया। उस वक्त उन्होंने जो किया, वो जोगी के शब्दों में “मैं कभी नहीं भूल सकता।” उस रात रायपुर में आतिशबाजी सिर्फ एक जीत की नहीं थी,बल्कि छत्तीसगढ़ की नई राजनीतिक कहानी की शुरुआत थी। जहां दिल्ली के गलियारों से चली एक ‘Get Ready’ की फुसफुसाहट,रायपुर के ‘पहुना विश्रामगृह’ में जाकर…पहले मुख्यमंत्री के शपथ मंच तक पहुंची थी। पांचवी कहानी- छत्तीसगढ़ के इतिहास में नीतीश कुमार का योगदान छत्तीसगढ़ के पहले राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय की नियुक्ति और शपथ ग्रहण की टाइमिंग तय करने में बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अहम भूमिका थी। नीतिश कुमार ने केंद्र के गृह मंत्रालय को सुझाव दिया था कि नए राज्य का गठन और मुख्यमंत्री का शपथ समारोह 1 नवंबर की मध्यरात्रि में ही होना चाहिए। यानी जब घड़ी 12 बजाए, तब भारत के नक्शे में नया राज्य दर्ज हो। उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि दिनेश नंदन सहाय, जो बिहार के पूर्व पुलिस अधिकारी और सख्त प्रशासक रहे हैं। उन्हें नए राज्य का पहला राज्यपाल बनाया जाए, ताकि शुरुआत से ही प्रशासनिक अनुशासन और संवैधानिक मर्यादा बनी रहे। छठवीं कहानी- दिग्विजय ने जोगी से कहा था पहले आदिवासी CM बनोगे 1 नवंबर 2000 की आधी रात रायपुर की पुलिस लाइंस में हल्की ठंडक के बीच मंच सजा था। सामने भीड़ थी, और मंच पर थे अजीत जोगी, छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री। शपथ ग्रहण समारोह के बीच दिग्विजय सिंह ने मुस्कुराते हुए जोगी को एक पुरानी बात याद दिलाई। उन्होंने कहा कि याद है 1986 में, जब तुमने आईएएस से इस्तीफा दिया था और मैं तुम्हें इंदौर से खास विमान से दिल्ली ले गया था? तब तुमने पूछा था-क्या ये फैसला सही है? मैंने कहा था- जिस दिन कोई आदिवासी मुख्यमंत्री बनेगा, वो तुम ही रहोगे। वो भविष्यवाणी अब सच साबित हो गई। इसी दौरान खबर आई थी कि केंद्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और सुमित्रा महाजन विशेष विमान से रायपुर पहुंचे हैं। जोगी को तुरंत एहसास हुआ कि दाल में कुछ काला है। कांग्रेस के भीतर डर था कि विद्याचरण शुक्ल कहीं भाजपा से मिलकर विधायक न तोड़ लें। हालांकि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय ने जोगी को दिलाई थी CM पद की शपथ छत्तीसगढ़ के पहले राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय ने आधी रात को जोगी को शपथ दिलाई। शपथ के बाद जोगी ने जनता के नाम संदेश दिया -“कई वर्षों से हमने और हमारे पूर्वजों ने एक सपना देखा था – आदर्श छत्तीसगढ़ का सपना।अब वो सपना हकीकत है। लेकिन विकास का सफर आसान नहीं होगा। मैं आपके प्रथम विनम्र सेवक के रूप में पूरी निष्ठा से काम करूंगा। जोगी ने चाहा कि वे शपथ छत्तीसगढ़ी भाषा में लें, लेकिन राज्यपाल ने संवैधानिक कारणों से मना कर दिया। शपथ खत्म होते ही मीडियाकर्मी सवालों की बौछार लेकर पहुंचे- नए राज्य की प्राथमिकताएं क्या होंगी, दृष्टि क्या है?जोगी ने सिर्फ एक वाक्य कहा-“मेरे नेतृत्व में छत्तीसगढ़ राज्य सत् के मार्ग पर चलेगा।” यही लाइन अगले दिन राजनीतिक विवाद का कारण बन गई। विपक्ष ने आरोप लगाया कि जोगी ने “सत् के मार्ग” कहकर सतनामी समाज का पक्ष लिया है, जबकि उन्हें सभी समुदायों की बात करनी चाहिए थी। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा। लेकिन अदालत ने साफ कहा“अगर कोई मुख्यमंत्री सत्य के मार्ग पर चलने की बात करता है, तो इसमें आपत्ति की कोई गुंजाइश नहीं।” वो रात छत्तीसगढ़ के लिए इतिहास बन गई और जोगी के लिए, एक भविष्यवाणी का सच होना। सातवीं कहानी: रेणु के पास जोगी के शपथ ग्रहण समारोह का नहीं था गेट पास रायपुर पुलिस ग्राउंड में 1 नवंबर 2000 की रात अजीत जोगी प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि बिना पास, बिना पहचान किसी को अंदर जाने की इजाजत नहीं थी, क्योंकि उसी रात यहां केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी और कई बड़े नेता आने वाले थे। इस ऐतिहासिक पल में अजीत जोगी की पत्नी, रेणु जोगी, खुद अंदर नहीं जा पा रही थीं। वो मुस्कुराते हुए याद करती हैं और बताती हैं कि“राज्य बनने का ऐलान हो गया था, लेकिन उस पूरे समय में मेरी जोगी जी से कोई मुलाकात ही नहीं हुई। शपथ से पहले मैं बस यही सोच रही थी कि काश, किसी तरह वहां पहुंच पाऊं। रेणु जोगी बताती हैं कि उस रात वो एक छोटी सी मारुति 800 में बैठीं “हम शायद 6 से 8 लोग थे। मैं, अमित (बेटा) और कुछ करीबी। किसी तरह गाड़ी में बैठे और पुलिस ग्राउंड पहुंचे, लेकिन वहां पहुंचते ही रोक लिया गया। मेरे पास कोई पहचान पत्र या आमंत्रण पास नहीं था। सुरक्षा इतनी सख्त थी कि कोई बात सुनने को तैयार ही नहीं था। वो कुछ देर तक गेट पर खड़ी रहीं, जब तक किस्मत ने साथ नहीं दिया। तभी वहां से गुजर रही थीं विधायक गीता देवी सिंह, जो बाद में छत्तीसगढ़ की पहली महिला बाल विकास मंत्री बनीं। रेणु जोगी बताती हैं- मैंने उन्हें इशारे से रोका और कहा मुझे अंदर ले चलिए। उन्होंने बिना कुछ पूछे अपनी गाड़ी में बिठाया और शपथ समारोह तक पहुंचाया। आखिरकार, जब रात के ठीक 12 बजे अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। भीड़ तालियों से गूंज उठी और दूर खड़ी रेणु जोगी की आंखों में चमक थी। वो पल सिर्फ राज्य के इतिहास का नहीं, एक पत्नी के धैर्य का भी हिस्सा बन गया। अब पढ़िए आठवीं कहानी: बिजली के लिए दिग्विजय से भिड़े थे जोगी राज्य बने अभी कुछ ही दिन हुए थे। नया छत्तीसगढ़… पर खजाना खाली। ऊपर से अकाल, सूखे खेत और बेरोजगार मजदूरों की लंबी कतार। मुख्यमंत्री बने अजीत जोगी ने आधी रात को मुख्य सचिव और अधिकारियों की बैठक बुलाई। आदेश दिया “सुबह से पूरे प्रदेश में राहत कार्य शुरू हो जाएं, लोगों को काम और मजदूरी मिले। इस दौरान अधिकारियों ने जवाब दिया कि सर, खजाना खाली है… भुगतान कैसे होगा? जोगी मुस्कुराए और बोले- पैसे का इंतजाम मैं कर लूंगा, आदेश जारी करो। अगले दिन जब उन्होंने स्थिति देखी, तो सचमुच तिजोरी खाली मिली, तभी दिमाग में बिजली चमकी “छत्तीसगढ़ के पास सरप्लस बिजली है। जोगी ने तय किया कि बिजली बेचकर पैसा जुटाया जाएगा। अधिकारियों ने कहा “कानून मना करता है, बंटवारा तय नहीं हुआ।” जोगी बोले “जो भी करना पड़े, करो, लेकिन राहत रुके नहीं।”15 दिन में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल का गठन हो गया। दिग्विजय सिंह नाराज़ हुए, सोनिया गांधी तक शिकायत पहुंची। दिल्ली बुलावा आया।सोनिया ने सख्त लहजे में पूछा मुख्यमंत्री बनते ही ऐसा फैसला क्यों? जोगी ने शांत होकर कहा मैडम, खजाना खाली था… अगर राहत शुरू नहीं करता तो लोग भूख से मर जाते।” सोनिया थोड़ी देर चुप रहीं, फिर बोलीं -ठीक है, लेकिन विवाद सुलझा लो।” बाहर निकले तो दिग्विजय सिंह ने कहा -हम सारी सरप्लस बिजली खरीदना चाहते हैं, पर फिलहाल नगद नहीं दे सकते।”जोगी हंसे और बोले – “मेरी दुकान में बोर्ड लगा है- आज नगद, कल उधार।” यहीं से छत्तीसगढ़ की पहली कमाई शुरू हुई। बिजली बिकी, खजाना भरा और गांवों में राहत पहुंची। (नोटः सभी कहानियां अजीत जोगी की पत्नी और JCCJ सुप्रीमो रेणु जोगी से हुई बातचीत और उनकी लिखी किताब ‘अजीत जोगी सपनों का सौदागर’ से संकलित की गई हैं)
छत्तीसगढ़ गठन…जोगी के CM बनने की 8 कहानियां:बिना एंट्री पास शपथ-ग्रहण में गईं थीं रेणु, दिग्विजय से भिड़े अजीत, सोनिया ने लगाई थी क्लास

















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