गांव-गांव में विवाद; हालात जानने आदिवासियों के बीच भास्कर, समाधान के लिए सरकार और आदिवासी नेताओं से बात बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले का चांदा गांव जहां बमुश्किल से 25 से 30 घर हैं। इनमें से केवल पांच घर के लोग आदिवासी हैं और बाकी ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है। यही हाल गोंगला गांव का है जहां पर तकरीबन 40 घर हैं और छह या सात घर के लोगों को छोड़कर बाकी लोग धर्मांतरण कर चुके हैं। नारायणपुर जिले में तेरदुल, टिमनार, ताड़ोपाल, रेमावंड, देवगांव, नेलवाड़ और आसपास के छोटे-छोटे गांव में इसी तरह के नजारे देखने को मिले। इन गांवों में तनाव है और वर्ग संघर्ष की स्थिति है। एक तरफ हैं आदिवासी और दूसरी तरफ धर्म परिवर्तन कर ईसाई बन चुके आदिवासी। धर्म बदल चुके लोगों को आदिवासी अब अपनी परंपरा और संस्क़ृति का नहीं मानते। उन्हें श्मशान घाट में घुसने नहीं दे रहे। इसके अलावा अन्य रीति-रिवाजों में भी उन्हें अपने कार्यक्रम में शामिल नहीं करते। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बनकर यह समस्या विस्तार लेती जा रही है। वैसे तो बस्तर से लेकर सरगुजा तक पूरे राज्य में लगातार धर्मांतरण कराए जाने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन बस्तर संभाग के सातों जिलों में अजीब सा तनाव है। नारायणपुर के अलावा कांकेर, बीजापुर, सुकमा, कोंडागांव, बस्तर और दंतेवाड़ा में धर्मांतरण का खेल खुलकर चल रहा है और उसका विरोध भी उसी स्तर पर हो रहा है। बस्तर में आज धर्मांतरण ने गांव-गांव में संघर्ष पैदा कर दिया है। करीब 60 लाख की आबादी वाले बस्तर संभाग में आदिवासी ही आदिवासी के दुश्मन बने हुए हैं। बस्तर आईजी पी. सुंदरराज के अनुसार प्रशासन के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है कि कितने लोगों ने धर्म बदल लिया है लेकिन इस खेल के विरोध में मोर्चा संभाले लोगों का मानना है कि दो लाख से अधिक लोगों का धर्मांतरण कराया जा चुका है। आश्चर्य नहीं होगा कि यह आंकड़ा इससे कहीं अधिक निकले। विरोध और समर्थन का विवाद लगातार बढ़ने के कारण ग्रामीण आदिवासी डरे सहमे हैं। पूरे मामले को आदिवासी जिस तरह देख रहे हैं, उससे यही बात समझ आती है कि धर्मांतरण कराने वालों ने पहले दूरस्थ क्षेत्र के उन गरीब आदिवासियों को अपना निशाना बनाया जहां नक्सल समस्या के कारण प्रशासन और बाहरी दुनिया के लोगों का पहुंचना कठिन था। बस्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में मलेरिया एक बड़ी बीमारी है। अजीब स्थिति: जाति एक और आराध्य का जन्मदिन मनाने दो पंडाल
धर्मांतरण के चलते माहरा समाज के बीच अजीब स्थिति निर्मित हो गई है। समाज के लोग दो धड़े में इस तरह बदले हुए नजर आते हैं उनके आराध्य जत्तू महाराज के जन्म दिन के अवसर पर कई गांवों में दो-दो पंडाल लगाए जाते हैं। एक पंडाल आदिवासी समाज के लोग और दूसरा पंडाल ईसाई बन चुके लाेग लगाते हैं। यही हाल जगदलपुर जिले में मिजनार पंचायत का है। यहां तो पंचायत ही दो भागों में बंट गई है। एक आदिवासियों की और दूसरी ईसाइयों की। अंतिम संस्कार के दौरान शुरू हुआ विवाद अब गंभीर
आदिवासियों और मतांतरित आदिवासियों के बीच विवाद अंतिम संस्कार के दौरान लगातार हो रहा है। आदिवासियों को इस बात पर आपत्ति है कि जब लोग ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके हैं तो उनको ईसाइयों की कब्रगाह में जाना चाहिए। कन्वर्टेड लोग जबरन गांव के श्मशान घाट में अंतिम संस्कार करने लगे तब यह विवाद काफी बढ़ गया। कानूनी लड़ाई चली और कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा है कि जो जिस धर्म का है, वह अपने धर्म में अंतिम संस्कार करे। पर गांवों में इस विवाद का निपटारा आज तक नहीं हो पाया है और संघर्ष की स्थिति निर्मित होती रहती है। ये हैं सरकार के रास्ते कड़ा कानून शीघ्र आएगा
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय धर्मांतरण के खिलाफ जल्द ही कड़ा कानून लागू करना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि पुराने कानून में बदलाव कर जबरन धर्म परिवर्तन करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का प्रावधान किया जा रहा है। कानून का भय होगा तो धर्मांतरण का खेल करने वालों पर रोक लगेगी। इसके अलावा शासन की योजनाओं का गरीब आदिवासियों को पूरी तरह मिले, यह भी सरकार सुनिश्चित करेगी। बस्तर का अलग एक्शन प्लान बनेगा
गृहमंत्री विजय शर्मा का कहना है कि जो भी धर्मांतरण करना चाहेगा, उसे संबंधित जिला कलेक्टर को आवेदन देना होगा। जांच मेंं कलेक्टर देखेंगे कि दबाव या लालच में तो नहीं किया जा रहा है। यानी प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही कोई धर्म परिवर्तन कर सकेगा। प्रस्तावित कानून में सजा भी कड़ी की जा रही है। बस्तर का मामला बाकी राज्य से अलग हो गया है। वहां समस्या के निराकरण के लिए अध्ययन करने की जरूरत है और सीएम से चर्चा कर एक्शन प्लान तैयार किया जाएगा। लुभाने वालों को एक्सपोज करेंगे
बस्तर के आदिवासी नेता और वनमंत्री केदार कश्यप का मानना है कि प्रशासन कानूनी रूप से सख्ती तो करेगा। साथ ही समाज के वरिष्ठ लोगों के माध्यम से आदिवासी समाज में जनजागृति लाई जाएगी। ग्रामीणों को लुभाने का काम करने वाले लोगों को समाज के बीच एक्सपोज किया जाएगा ताकि लोग इस तरह का दुस्साहस ना करें। ऐसे लोगों के खिलाफ समाज की ओर से कार्रवाई की जाएगी। आदिवासी नेताओं की राय सामाजिक सक्रियता से रोकना होगा
पूर्व केंद्रीय मंत्री और आदिवासी नेता अरविंद नेताम ने कहा कि पिछले दिनों राजाराम पठार में हुए सम्मेलन में आदिवासी समाज ने धर्म परिवर्तन के इस खेल के बारे में विचार किया गया। जरूरत महसूस की गई है कि सोशल मीडिया से समाज के लोगों में जागृति लाई जाए। सामाजिक सक्रियता पर जोर देकर गरीब आदिवासियों को धर्म बदलने से रोकने का अभियान बारिश के बाद तेज होगा। विदेशी फंडिंग रोकनी ही होगी
पूर्व विधायक राजाराम तोड़ेम का कहना है कि जबरन हो रहे धर्मांतरण को तो रोकना ही होगा। मिशनरीज को विदेश से मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकने से इनका खेल अपने आप रुक जाएगा। धर्म बदलने वालों को संविधान से जो विशेष सुविधाएं मिल रही हैं, वे बंद हो जाएंगी। यह समझाने के लिए अभियान चलाने की जरुरत है कि धर्म बदलने से ये सुविधाएं बंद हो जाएंगी। हमें लौट आने की उम्मीद है
धर्मांतरण के खिलाफ मोर्चा खोलने वालों में प्रमुख भूमिका निभाने वाले रुपसाय सलाम का कहना है कि जिन लोगों ने लालच या दबाव में आकर अपना धर्म बदल लिया है, उनको आदिवासी समाज में वापस लाने के लिए अभियान चलाया जाएगा। सर्व आदिवासी समाज और गोंडवाना समाज के बैनर तले पूरे बस्तर में लोगों को समझाने का काम किया जाएगा। उम्मीद है कि लोग अपने मूल धर्म में लौट आएंगे।
बस्तर में वर्ग संघर्ष:दो वक्त की रोटी, थोड़े पैसे, मलेरिया का इलाज …और बदल गया धर्म

















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