डॉ. भागवत ने कहा -:सभी विधिताओं को साथ लेकर चलना ही धर्म है

पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वयं संघ के प्रति निष्ठा और समर्पण से काम करने वाले काशीनाथ गोरे स्मृति स्मारिका का विमोचन करने पहुंचे संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि जिस प्रकार दीये स्वयं जलकर रोशनी देता है, ऐसी ही तपस्या 100 साल से स्वयंसेवकों ने की है। सभी विविधताओं को साथ लेकर चलना ही धर्म है। इसे सभी को समझना होगा और यह विचार करना होगा कि हम अपने जीवन में क्या कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आपमें ऐसा सद्गुण होना चाहिए कि लोग आपकी ओर खींचे चले आएं। आरएसएस प्रमुख डॉ. भागवत ने 30 मिनट के संबोधन में संघ और हिंदुत्व को लेकर अपनी बातें रखी। उन्होंने कहा कि अपने आप को अपडेट करना, शहरों में जाकर अपना संपर्क बढ़ाना स्वयंसेवक का काम है। आज हम संघ शताब्दी वर्ष मना रहे हैं। संघ के इतने लंबे सफर और इसे आगे बढ़ाने के पीछे स्वयं सेवकों का ही योगदान है। डॉ. हेडगेवार को लेकर कहा कि उन्होंने स्वयं सेवकों में हौसला पैदा किया, इच्छाशक्ति जागृत करने का
काम किया। सभी बाधाओं व चुनौती में संघ को स्वयंसेवक ने बढ़ाया। शेष|पेज 18 शिवाजी महाराज जैसा पराक्रम सब चाहते हैं
उन्होंने कहा कि शिवाजी महाराज जैसा पराक्रम सब चाहते है, लेकिन उसे अर्जित करना कठिन है। एक व्यक्ति के नाते परिवार को सुखी रखना, समाज को भी संस्कारित करना है तो एक संतुलन चाहिए। ताना जी के सामने भी दुविधा आई थी कि कुटुंब को देखें या समाज को। मेरा कुल क्यों ठीक रहे, समाज हित के लिए, समाज राष्ट्र के लिए श्रेष्ठ बने, इसी चिंतन में सर्वे भवन्तु सुखिनः के दर्शन का साक्षात्कार होता है। ऐसी जिसकी प्राथमिकता सुनिश्चित हो जाती है, वह सबके लिए सज्जन शक्ति होते हैं। सत्य स्वयंसेवक बनने के लिए जो निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं, उनका सामान्य जीवन भी अनुकरणीय व प्रेरक बन जाता है। स्व. काशीनाथ गोरे का व्यक्तित्व ऐसे ही सत्य स्वयंसेवक का था।

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