छत्तीसगढ़ में जमीन से लेकर पहाड़ तक विराजे बप्पा:भूमिफोड़-गणपति, दांत टूटने, प्रतिमा बढ़ने समेत बप्पा के 7 पावन धाम, जानिए कैसे पहुंचें, कहां ठहरें

27 अगस्त 2025… भगवान गणेश स्थापना का पावन दिन। पूरे देश में गणेशोत्सव की गूंज है और हर जगह ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारे सुनाई दे रहे हैं। इस अवसर पर जब भक्त गणेश मंदिरों की ओर रुख करते हैं, तो छत्तीसगढ़ की आस्था की भूमि और भी खास बन जाती है। यहां के गणेश मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं हैं, बल्कि सदियों पुरानी मान्यताओं और अद्भुत कहानियों का खजाना भी हैं। कहीं बप्पा की प्रतिमा तालाब से प्रकट हुई, कहीं पहाड़ी की गुफा से मिली, तो कहीं दंत टूटने की कथा से जुड़ी। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं के पूरे होने पर इन मंदिरों में चांदी का छत्र चढ़ाने की परंपरा आज भी निभाते हैं। गणेश चतुर्थी पर जब हजारों श्रद्धालु छत्तीसगढ़ के इन मंदिरों में उमड़ते हैं, तो वातावरण भक्ति, विश्वास और उत्साह से सराबोर हो जाता है।यही वजह है कि छत्तीसगढ़ को गणेश भक्ति की आध्यात्मिक धरा कहा जाता है, जहां हर मंदिर भक्त को बप्पा के और करीब ले जाता है। चलिए जानते हैं, बेमेतरा के सिद्धि विनायक श्री शमी गणेश मंदिर, दंतेवाड़ा के ढोलकल, बस्तर के एकाश्म, बालोद के भूमिफोड़, कांकेर के छोटी सूंड, राजनांदगांव के रियासत कालीन और मुंगेली के मदकू द्वीप गणपति मंदिर के बारे में। यहां कैसे पहुंचें, ठहरने की क्या व्यवस्था है सब कुछ विस्तार से… प्राचीन सिद्धि विनायक श्री शमी गणेश मंदिर (बेमेतरा) छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने और दुर्लभ मंदिरों में से एक बेमेतरा का प्राचीन सिद्धि विनायक श्री शमी गणेश मंदिर है। यह मंदिर 706 ईस्वी में स्थापित हुआ था। इसे देश का पहला अष्टकोणीय गणेश मंदिर माना जाता है। मंदिर परिसर में मौजूद अष्टकोणीय कुएं और शिलालेख इसकी प्राचीनता का प्रमाण देते हैं। हालांकि शिलालेख की भाषा या लिपि अब तक कोई पढ़ नहीं सका है। 1880 में महाराष्ट्रीयन ब्राह्मणों ने इसका जीर्णोद्धार कराया और गणेश जी की नियमित पूजा शुरू की। आज भी भक्त यहां आकर बप्पा के दर्शन कर विशेष शांति का अनुभव करते हैं। प्राचीन सिद्धि विनायक श्री शमी गणेश मंदिर (बेमेतरा) रायपुर से दूरी: 69 किमी कैसे जाएं: भाठागांव बस स्टैंड से बेमेतरा के लिए बसें उपलब्ध। पर्सनल साधन से भी जा सकते हैं। मार्ग: रायपुर → धमधा → बेमेतरा, समय: 2 से 2.5 घंटे रुकने की व्यवस्था: मंदिर परिसर और धर्मशाला। होटल/लॉज (₹500–1500 प्रति दिन) ढोलकल गणेश (दंतेवाड़ा) दंतेवाड़ा जिले में स्थित ढोलकल पहाड़ी पर विराजमान गणेश प्रतिमा 11वीं शताब्दी की है। करीब साढ़े तीन फीट ऊंची यह प्रतिमा काले ग्रेनाइट पत्थर से बनी है। जनवरी 2017 में नक्सलियों ने इस प्रतिमा को 2500 फीट ऊंची पहाड़ी से नीचे गिरा दिया था। जिससे यह 15 टुकड़ों में टूट गई। बाद में प्रतिमा को फिर से खोजकर स्थापित किया गया। स्थानीय मान्यता है कि, यहीं पर परशुराम और गणेश के बीच युद्ध हुआ था। इसी दौरान गणेश का एक दंत टूटा था। इसी कारण आसपास का इलाका “फरसपाल” नाम से प्रसिद्ध है। ढोलकल गणेश (दंतेवाड़ा) रायपुर से दूरी: 358 किमी कैसे जाएं: बस और ट्रेन सेवा उपलब्ध। मार्ग: रायपुर → धमतरी → कांकेर → कोंडागांव → जगदलपुर → दंतेवाड़ा → बारसूर → फरसपाल → ढोलकल बेस, समय: 8-9 घंटे। रुकने की व्यवस्था: दंतेवाड़ा और जगदलपुर में होटल/लॉज उपलब्ध। एकाश्म गणेश मंदिर (बस्तर) बस्तर जिले के देवनगरी बारसर में स्थित एकाश्म गणेश मंदिर 11वीं-12वीं शताब्दी का है। जिसे छिंदक नागवंशी राजा ने बनवाया था। यहां विश्व की तीसरी सबसे बड़ी और पहली जुड़वा गणेश प्रतिमा स्थापित है।करीब एक हजार साल पुरानी यह प्रतिमा एक ही पत्थर से तराशी गई है। प्रतिमा की विशालता और अनोखापन ही इसे खास बनाता है। देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग इस अद्भुत प्रतिमा को देखने आते हैं। एकाश्म गणेश मंदिर (बस्तर) रायपुर से दूरी: 282 किमी कैसे जाएं: बस सुविधा, स्टेशन से मंदिर तक टैक्सी/ऑटो मार्ग: रायपुर → धमतरी → कांकेर → कोंडागांव → जगदलपुर, समय: 6–7 घंटे रुकने की व्यवस्था: जगदलपुर शहर में ठहरने की व्यवस्था। भूमिफोड़ गणेश मंदिर (बालोद) बालोद जिले के मरारपारा गांव में स्थित भूमिफोड़ गणेश मंदिर की कहानी भी बेहद रोचक है। यहां करीब 100 साल पुरानी गणेश प्रतिमा विराजमान है। खास बात यह है कि समय के साथ प्रतिमा की लंबाई लगातार बढ़ रही है। संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर बड़ी संख्या में दंपती यहां पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि सच्चे मन से प्रार्थना करने पर बप्पा हर इच्छा पूरी करते हैं। भूमिफोड़ गणेश मंदिर (बालोद) रायपुर से दूरी: 123 किमी कैसे जाएं: बस, ट्रेन और बालोद स्टेशन से ऑटो/टैक्सी की व्यवस्था। मार्ग: रायपुर → दुर्ग → बालोद, समय: 2–2.5 घंटे रुकने की व्यवस्था: धर्मशाला और होटल उपलब्ध हैं। छोटी सूंड वाले गणेश (कांकेर) कांकेर जिले के गढ़बांसला गांव में छोटी सूंड वाले गणेश जी की प्रतिमा सैकड़ों साल पहले तालाब में तैरते मिली थी। इस प्रतिमा को मंदिर तक लाने में भक्तों को कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ा। रास्ते में बार-बार बैलगाड़ियों के पहिए टूटते रहे। कहा जाता है कि, जिस स्थान पर 12वां पहिया टूटा, वहीं गणेश जी की मूर्ति स्थापित की गई। भक्त मानते हैं कि यहां आने वाला हर श्रद्धालु बप्पा की मनोकामना पूरी होती है। इस प्रतिमा की खासियत है कि इसमें गणेश जी की सूंड सामान्य से छोटी है। इसलिए इसे “छोटी सूंड वाले गणेश” कहा जाता है। छोटी सूंड वाले गणेश (कांकेर) रायपुर से दूरी: 143 किमी कैसे जाएं: स्टेशन से बस/टैक्सी, पर्सनल साधन। मार्ग: रायपुर → धमतरी → कांकेर, समय: 4–5 घंटे रुकने की व्यवस्था: छोटे होटल/लॉज (बजट 600–1200 रुपए दिन) रियासत कालीन गणेश मंदिर (राजनांदगांव) राजनांदगांव का रियासत कालीन गणेश मंदिर करीब 168 साल पुराना है। इसकी स्थापना महंत राजा दिग्विजय दास के पूर्वजों ने कराई थी। इस मंदिर की खास परंपरा है कि, जब किसी भक्त की मनोकामना पूरी होती है, तो वह गणेश जी को चांदी का छत्र चढ़ाता है। आज तक सैकड़ों चांदी के छत्र इस मंदिर में चढ़ाए जा चुके हैं, जो इसे खास पहचान दिलाते हैं। गणेश चतुर्थी पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। रियासत कालीन गणेश मंदिर (राजनांदगांव) रायपुर से दूरी: 72 किमी कैसे जाएं: बस, टैक्सी और ट्रेन सुविधा मार्ग: रायपुर → दुर्ग → राजनांदगांव, समय: 1.5 घंटे रुकने की व्यवस्था: होटल और धर्मशालाएं। (700–2000 रुपए हर दिन) मदकू द्वीप गणपति मंदिर (मुंगेली) मुंगेली जिले के शिवनाथ नदी के बीच बसे मदकू द्वीप पर गणेश मंदिर कल्चुरी कालीन राजाओं ने बनवाया था। यहां गणपति की प्राचीन प्रतिमा विराजित है। नदी के बीच स्थित यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है। श्रद्धालु यहां आकर बप्पा के साथ-साथ द्वीप की खूबसूरती का भी आनंद लेते हैं। धार्मिक और पर्यटन दोनों ही दृष्टि से यह स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। मदकू द्वीप गणपति मंदिर (मुंगेली) रायपुर से दूरी: 103 किमी कैसे जाएं: बस, बिलासपुर रेलवे स्टेशन तक ट्रेन सुविधा। मार्ग: रायपुर → बिलासपुर → मुंगेली → मदकू द्वीप, समय: 3–4 घंटे रुकने की व्यवस्था: होटल और धर्मशालाएं। बिलासपुर और मुंगेली में होटल (₹800–2500/दिन) प्रदेश में मिली गणेश मूर्तियों के प्रमाणित साक्ष्य- डॉ. रामेंद्रनाथ मिश्रा छत्तीसगढ़ के इतिहासकार डॉ. रामेंद्रनाथ मिश्रा बताते है कि, रायपुर और छत्तीसगढ़ में गणेश पूजा और चतुर्थी भव्य तरीके से मनाने की प्रक्रिया अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुई। क्रांतिकारी कार्यक्रमों की आड़ में हिंदुस्तानियों को एकजुट करते थे। अभी प्रदेश में रिसर्च की और आवश्यकता है, क्योंकि इतिहास के कई पन्ने अभी छत्तीसगढ़ की जमीन में दफन हैं।

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