आदिवासी बाहुल्य जिले में धूमधाम से मनाया गया कजलियां पर्व:गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में महिलाओं ने पारंपरिक गीत गाकर किया भुजरियां का विसर्जन

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में आज कजलियां पर्व धूमधाम से मनाया गया। यह आदिवासी बाहुल्य जिला है, जहां इस पर्व का विशेष महत्व है। कजलियां प्रकृति प्रेम और खुशहाली से जुड़ा पर्व है, जिसका प्रचलन सदियों से चला आ रहा है। राखी पर्व के दूसरे दिन मनाए जाने वाले इस पर्व को कई स्थानों पर भुजलिया या भुजरियां नाम से भी जाना जाता है। बुजुर्गों के अनुसार, भुजरिया नई फसल का प्रतीक है। कजलियां पर्व के लिए श्रावण मास की अष्टमी और नवमीं तिथि को बांस की छोटी-छोटी टोकरियों में मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं या जौं के दाने बोए जाते हैं। कजलियां पर्व राखी के दूसरे दिन मनाने की परंपरा गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में यह परंपरा राखी के दूसरे दिन मनाई जाती है। इसमें नागपंचमी के दूसरे दिन खेतों से लाई गई मिट्टी को बर्तनों में भरकर उसमें गेहूं बोए जाते हैं। इन बीजों में रक्षा बंधन के दिन तक गोबर की खाद और पानी दिया जाता है और देखभाल की जाती है। आल्हा-ऊदल काल से जुड़ी है यह परंपरा इस पर्व से जुड़ी मान्यता के अनुसार इसका प्रचलन राजा आल्हा ऊदल के समय से है। यह पर्व अच्छी बारिश, अच्छी फसल और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है। लगभग एक सप्ताह में गेहूं के पौधे उग आते हैं, जिन्हें भुजरियां कहा जाता है। रक्षा बंधन के दूसरे दिन महिलाएं इनकी पूजा-अर्चना करके इन टोकरियों को जल स्त्रोतों में विसर्जित करती हैं। इस पर्व में लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और घर के बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते हैं। श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। आज गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के गांवों में महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए और गाजे-बाजे के साथ तट या सरोवरों में कजलियां विसर्जन के लिए गईं। यह दृश्य स्थानीय संस्कृति और परंपरा के प्रति लोगों के लगाव को दर्शाता है।

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