अपनों से दूर परायों में मिला भाई-बहन का प्यार:वृद्धाश्रम में शिवनाथ के हाथों पर कुंवर ने बांधी रक्षा-डोर;1930 के बाद दुर्लभ संयोग,दिनभर शुभ मुहूर्त

65 साल के शिवनाथ की आंखों में नमी थी, जब 68 साल की कुंवर बाई ने उनके माथे पर तिलक लगाया, आरती उतारी और राखी बांधकर मुंह मीठा किया। इसके बाद शिवनाथ ने अपनी जेब से कपड़े की एक छोटी सी गठरी निकाली, जिसमें कई मोटी-मोटी गांठें ऐसे बंधी थीं, जैसे वक्त ने इन्हें सालों से जकड़ रखा हो। शिवनाथ के कांपते हाथ एक-एक कर उन गांठों को जल्दी-जल्दी खोल रहे थे। कुछ ही पलों बाद, सिक्कों की हल्की-सी खनक गूंजी। कुछ पुराने सिक्कों में से एक चमकदार 10 रुपए का सिक्का उन्होंने ‘बहन’ कुंवर बाई की हथेली में रख दिया। खून का रिश्ता न होते हुए भी, ये बंधन उन रिश्तों से कहीं गहरा है, जिन्हें उम्र के इस मोड़ पर अपनों ने छोड़ दिया। रक्षाबंधन के त्योहार पर ये नजारा रायपुर के संजीवनी वृद्धाश्रम का है, जहां अब ये बुजुर्ग ही एक-दूसरे का सहारा हैं, और यही उनका असली परिवार। आज भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और विश्वास का प्रतीक रक्षाबंधन पर्व मनाया जा रहा है। पंडितों के अनुसार, वर्ष 2025 का रक्षाबंधन नक्षत्र, वार, राखी बांधने का समय और पूर्णिमा तिथि का आरंभ और अंत लगभग वैसा ही शुभ संयोग लेकर आया है, जैसा कि वर्ष 1930 में रक्षाबंधन के दिन देखा गया था। तब भी 9 अगस्त को ही था रक्षाबंधन मनाया गया था। इस रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं होने से भाई-बहन को इंतजार नहीं करना पड़ेगा। बल्कि सूर्य उदय के साथ ही पूर्णिमा तिथि होने से शुभ मुहूर्त दिनभर रहेगा। इस दौरान बहनें अपने भाइयों का तिलक कर कलाइयों पर राखियां बांध सकेंगी। रायपुर के संजीवनी वृद्धाश्रम में रक्षाबंधन पर्व की तस्वीरें- अकेले जिंदगी गुजारी, यहां आकर मिला परिवार शिवनाथ चम्पाटे ने बताया कि ‘मैंने शादी नहीं की, न ही कोई अपना परिवार है। जिंदगी भर पास ही बने विद्यापीठ में नौकरी करता रहा। वक्त गुजरता गया, पर सहारा देने वाला कोई नहीं बचा। अब उम्र के इस पड़ाव पर,आकर पहली बार किसी ने कलाइयों में राखी बांधी है। और भी लोग रक्षाबंधन के त्यौहार पर यहां राखी बांधने आ रहे हैं। यहां का माहौल देखकर बहुत खुशी हो रही है। अब तो लगता है कि इसी वृद्धाश्रम में बाकी बचे दिन आसानी से ऐसे ही बहनों और भाईयों के साथ कट जाएंगे’ यही असली परिवार कुंवर बाई की आंखों में हल्की कसक और अपनापन एक साथ झलकता है। वो कहती हैं ‘मैं रायपुर के सेजबहार इलाके में रहती थी। दो बेटे हैं, घर-परिवार था, लेकिन दिवाली से पहले बेटे से ही छोटी-सी कहासुनी इतनी बड़ी हो गई कि मैं नाराज होकर घर से निकल आई। महीनों हो गए यहां आए, लेकिन कोई लेने नहीं आया। मेरा कोई भाई भी नहीं है, यहां आकर मुझे भाई मिले, मां जैसी बड़ी बहनें मिलीं और अब यही मेरा असली परिवार है।’ साथ रहने की बात मत करो इसी तरह अशोक नगर गुढ़ियारी की रहने वाली पद्मावती अपनी बात हल्की मुस्कान और गहरी ठहराव के साथ कहती हैं ‘मेरा भरा-पूरा परिवार है, लेकिन घर में रोज होने वाले झगड़े-तनाव ने वहां रहना मुश्किल कर दिया। इसलिए मैं खुद ही इस वृद्धाश्रम में आ गई। वे बताती हैं कि कभी-कभी बेटा मिलने आता है, लेकिन साथ रहने के सवाल पर तुरंत हाथ हिलाते हुए कहती हैं। अब आप साथ रहने की बात ही मत करो…आगे बढ़ो। यहां सब एक-दूसरे का सहारा हैं, एक-दूसरे के लिए जीते हैं और अब यही मेरा परिवार है। जिनको आज राखी बांध रही हूं, यही लोग इस उम्र में काम आ रहे हैं। कभी कोई चलते हुए गिर जाए या सहारा और सुरक्षा देने की बात हो तो हम एक दूसरे के लिए खड़े रहते हैं। जिस भाई के लिए कड़ी मेहनत की उसने छोड़ दिया दुर्ग के अमलेश्वर सांकरा के रहने वाले कन्हैया नागदेव अपने बीते सालों की कहानी सुनाते हैं ‘मैंने कभी शादी नहीं की। मेरी कोई बहन भी नहीं है, अगर कोई था तो वो छोटा भाई था, जिंदगी का हर पल छोटे भाई को पढ़ाने-लिखाने, आगे बढ़ाने और उसकी शादी कराने में ही बीत गया। लेकिन जब उम्र के इस मोड़ पर आया, तो उसी भाई ने मुझे साल भर पहले इस वृद्धाश्रम में छोड़ दिया…और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।’ कन्हैया की आंखें नम हो जाती है। वे कहते हैं कभी-कभी दिल दुखता है कि जिस भाई के लिए इतना कुछ किया, उसी ने साथ छोड़ दिया। फिर एक पल ठहरकर हल्की मुस्कान के साथ जोड़ते हैं लेकिन सुकून भी है। यहां आकर कई ऐसे भाई मिले जो सगे भाई से भी ज्यादा प्यार देते हैं। मुझे चलने में तकलीफ होती है, तब यहां रहने वाले बुजुर्ग साथी ही भाई की तरह कंधा पकड़कर सहारा देते हैं। मैंने खुद घर छोड़ा लेकिन वापस लेने कोई नहीं आया रायपुर की ही मैना बताती हैं ‘मेरे दो लड़के हैं, लेकिन उनके साथ रहना मेरी बहुओं को रास नहीं आया। रोजाना कलह होती थी। ये देखकर मेरा मन दुखता था। उनकी तकलीफ को देखते हुए मैं खुद वृद्धाश्रम आ गई।’ वे कहती हैं उन्हें पता है कि मैं यहां हूं, लेकिन कोई लेने नहीं आया। अब यही मेरे भाई-बहन और पूरा परिवार है। शिवनाथ, कुंवर बाई, पद्मावती, कन्हैया, मैना ये सब अलग-अलग कहानियों के किरदार हैं, लेकिन एक ही मंच पर उम्र के इस पड़ाव को जी रहे हैं। जहां कभी बेटों का कंधा, बहनों का प्यार और दोस्तों की हंसी थी, वहां अब इन चार दीवारों के भीतर नए रिश्ते, नए भाई-बहन और नया परिवार है। रक्षाबंधन का दिन यहां सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों को फिर से जीने का दिन है। वो रिश्ते जो खून से नहीं, बल्कि समझ, दर्द और साथ निभाने के वादे से बने हैं। यहां राखी बांधने वाली बहन सिर्फ धागा नहीं, बल्कि भरोसा और अपनापन भी बांधती है। और भाई भी सिर्फ तोहफा नहीं देता, बल्कि यह एहसास दिलाता है कि उम्र चाहे जितनी हो जाए, किसी का सहारा बनने का वक्त कभी नहीं गुजरता। इस बार दुर्लभ संयोग, 1930 के बाद पहली बार ऐसे ग्रह नक्षत्र पंडितों ने बताया कि कई सालों के बाद इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा। इसलिए बहनें पूरे दिन किसी भी समय अपने भाइयों को राखी बांध सकती हैं। रक्षाबंधन पर पूरा दिन शुभ मुहूर्त रहेगा। शनिवार को ही है सावन पूर्णिमा 1930 में रक्षाबंधन 9 अगस्त को ही मनाया गया था और उस दिन भी शनिवार ही था। ठीक इसी तरह 2025 में ही 9 अगस्त को ही रक्षाबंधन है और इस बार भी रक्षाबंधन पर शनिवार ही है। इतना ही नहीं, वर्ष 1930 और 2025 दोनों में सावन पूर्णिमा की शुरुआत का समय भी लगभग एक जैसा है। 1930 में भी सौभाग्य योग और श्रवण नक्षत्र था जो इस साल भी है।

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