आजादी के संघर्ष के दौर को जानने वाले सन 1900 से आजाद भारत की दास्तां लिखे जाने वाले दिन तक को वंदे मातरम् युग कहते हैं। दरअसल, 1900 के प्रारंभ से ही देश में क्रांतिकारी गतिविधियों में तीव्रता आने लगी थी। इस शताब्दी की खास बात ये थी कि सिविलियंस सिर्फ आजाद भारत की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे। देश एक बड़े सोशल रिफार्म से भी होकर गुजर रहा था। आजादी की परिभाषा सिर्फ गोरों से मुक्ति तक सीमित नहीं रह गई थी। विचारों की स्वछंदता भी महत्वपूर्ण हो चली थी। भारतीय समाज अपने हितों को लेकर मुखर था। बड़े लीडर्स भी अपनों पर अपनों की गुलामी से मुक्त भारत चाहते थे। इस बड़ी लड़ाई की शुरुआत महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका के भारत लौटने से पहले छत्तीसगढ़ में शुरू हो चुकी थी। छत्तीसगढ़ में इस लड़ाई का जिम्मा पंडित सुंदर लाल शर्मा ने उठाया था। लेकिन इस समय, शर्मा केवल किताबों, कुछ चुनिंदा भवनों और विशेष दिन में होनी वाली गोष्ठियों का हिस्सा ही बनकर रह गए हैं। आजादी के मौके पर पढ़िए क्रांतिकारी पंडित सुंदर लाल शर्मा के वो किस्से, जिसके चलते समाज ने उन्हें सतनामी ब्राह्मण कहा, अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाला और महात्मा गांधी ने उन्हें अपना गुरु मान लिया… 8 नवंबर, साल 1925 राजिम में हिंदू सभा की एक विराट बैठक बुलाई गई। इसमें प्रदेश के प्रमुख हिंदू गृहस्थ, धर्मगुरु, आचार्य, महंत और समाज सुधारकों ने भाग लिया। बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे नारायण राव मेघावाले। उन दिनों भोई, चौहान, झिरिया, महरा, पनिका, भरेवा, गाड़ा, बया और बजनिया जाति के लोगों को अछूत माना जाता था। इनका मंदिरों में प्रवेश निषेध था। बैठक में समाज के सुवर्ण लोगों को निर्णय लेना था कि क्या इन्हें मंदिर में प्रवेश दिया जा सकता है? कई घंटों तक बहस चली। शास्त्रार्थ हुए। सबका मत था कि प्रवेश न दिया जाए। सिर्फ फैसला सुनाना बाकी था। लेकिन तभी चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए एक व्यक्ति खड़ा हुआ। सामान्य सी कद-काठी थी। पहनावा भी सामान्य था। सफेद कुर्ता, धोती और कांधे पर एक गमछा था। पर आवाज में वजनदार थी। इसने कहा- “मैं पंडित सुंदर लाल शर्मा आज से 15 दिनों के भीतर अस्पृश्य जाति के लोगों को राजीवलोचन मंदिर में प्रवेश कराउंगा।” ये सुनते ही सभा के लोग उठ खड़े हुए। शर्मा की बात को साइडलाइन नहीं किया जा सकता था। इससे पहले उन्होंने सतनामी समाज के लोगों को संगम पर खड़े होकर जनेऊ पहनाया था। गोष्ठी में शामिल लोग चिंतिंत हो गए। दूसरी ओर शर्मा अपनी बात कहकर निकल चुके थे। अंग्रेजों की बंदूकें भी नहीं आई काम इसके बाद जब भोई, कहार और दूसरी जाति के लोगों की भीड़ को लेकर शर्मा राजीवलोचन मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। यहां उन्हें फिरंगियों की सशस्त्र पुलिस और मजिस्ट्रेट का सामना करना पड़ा। उन्होंने अंग्रेज अधिकारी से कहा- गोलियां चलानी हो चला दीजिएगा। लेकिन आज मुझे और मेरे साथ आए लोगों को मंदिर प्रवेश से कोई नहीं रोक सकता। ये कहते हुए अंग्रेजों की तनी बंदूकों को शर्मा के साथ आई भीड़ ने पार किया। मंदिर प्रवेश हुआ। इस घटना के बाद समाज ने उन्हें बहिष्कृत किया। सतनामी ब्राह्मण कहकर पुकारा। लेकिन शर्मा अपना काम करते रहे। कंडेल सत्याग्रह से देश में चर्चा में आया छत्तीसगढ़ साल 1920, अंग्रेजों के विरोध के लिहाज से छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण कालखंडों में से एक था। दरअसल, रुद्री बांध से निकलने वाली नहर धमतरी के एक गांव कंडेल के समीप से आगे जाती थी। सिंचाई अफसर चाहते थे कि नहर के समीप स्थित इस गांव के लोग दस वर्ष का एग्रीमेंट कर लें, जिससे उन्हें सिंचाई कर मिल सके। जब कंडेल के लोग एग्रीमेंट के लिए तैयार नहीं हुए, तो अगस्त, 1920 में एक दिन नहर तोड़कर पानी कंडेल के खेतों की ओर बहा दिया गया। इसी दिन जमकर बारिश भी हुई। अब नहर से पानी लेने के आरोप में विभाग ने गांव वालों पर 4303 रुपए वसूल करने के लिए कुर्की वारंट जारी कर दिया। महात्मा गांधी को छत्तीसगढ़ लाने का श्रेय पंडित शर्मा को इस सत्याग्रह को फ्रंटफुट पर लीड कर रहे थे, बाबू छोटे लाल श्रीवास्तव और उन्हें पंडित सुंदरलाल शर्मा और नारायण राव मेघावाले का साथ मिला। प्लानिंग फेल होता देख अफसरों ने किसानों के पशुओं को नीलाम करना चाहा, मगर असफल रहे। लेकिन संघर्ष बढ़ता चला गया। तय किया गया कि महात्मा गांधी को धमतरी लेकर आया जाएगा और उन्हें लाने का जिम्मा मिला पंडित सुंदरलाल शर्मा को दिया गया। दिसंबर, 1920 की शुरुआत में ही शर्मा, गांधी को आमंत्रित करने कलकत्ता (कोलकाता) गए। इसके बाद 21 दिसंबर, 1920 को 11 बजे दोपहर गांधी धमतरी पधारे। जैसे ही ये खबर अधिकारियों को लगी, गांधी के आने से पहले ही इस जुर्माने की सजा वापस ले ली गई। तो इस तरह गांधी ने पंडित सुंदरलाल शर्मा को माना था अपना गुरु साल 1933 में जब गांधी दूसरी बार छत्तीसगढ़ आए। गांधी ने खुले मन से कहा कि भले ही पंडित सुंदरलाल शर्मा उनसे उम्र में छोटे हैं। लेकिन सामाजिक सुधार के क्षेत्र और अछूत प्रथा को खत्म करने के काम में वह दो साल मुझसे आगे चल रहे हैं। इस तरह गांधी ने न केवल पंडित सुंदरलाल शर्मा के योगदान की प्रशंसा की, बल्कि उन्हें अपने गुरु के तौर पर भी सहर्ष स्वीकार किया। जेल से निकाली पत्रिका, नाम दिया – श्री कृष्ण जन्म स्थान समाचार पत्र इतिहासकार रमेन्द्र नाथ मिश्र बताते हैं कि असहयोग आंदोलन के दौरान पंडित शर्मा को जेल जाना पड़ा। उन्होंने जेल से हस्तलिखित श्री कृष्ण जन्म स्थान समाचार पत्र निकाला। संभवत: देश में ये अपनी तरह का पहला अखबार था। यह समाचार पत्र द्विमासिक थी, प्रथम वर्ष में इसके 6 अंक निकले थे। छठे अंक का संकलन मिश्र के पास मौजूद है। मिश्र ने बताया, समाचार पत्र में जहां एक ओर जेल का समाचार होता था, तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने वाली रचनाएं होती थीं। व्यंग भी होता था, जो अंग्रेजों के लिए प्रयुक्त होता था। वहीं जेल से रिहा होने वाले सत्याग्रहियों को सम्मानित किया जाता था। अभिनंदन पत्र दिया जाता था। जंगल सत्याग्रह में शर्मा, नारायणराव मेघावाले, श्यामलाल सोम सहित कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। 8 माह से लेकर 9 वर्ष की सजा सुनाने के बाद सभी को रायपुर जेल में बंद कर दिया गया। नारायणराव मेघावाले साल 1923 में जब जेल से रिहा हुए, तब जेल में उन्हें पं. सुंदरलाल शर्मा ने अभिनंदन पत्र भेंट किया। जाओ प्रियवर मुक्त हो बंधन के दिन काट तेरे हित में हैं खड़े,
लाखों जोहत बाट अष्टमास विश्राम करि फिर नूतन बलधार जाओ भिड़ जावो सुदृढ़,
करो देश उद्धार यह भारत जौ लौ नहीं, फिर स्वतंत्र व्है जाय चाहे मर मिट जाइये, मत बैठिये थिराय
तन-बल, धन-बल, बाहु-बल यह जीवन अरु प्राण भारत माँ के चरण में कर दीजय बलिदान। हाथों से अखबार में चित्र बनाते थे पंडित सुंदरलाल शर्मा अपने अखबार में जेल की गतिविधियों को बेहतर समझाने के लिए शर्मा हाथों से चित्र भी बनाते थे। अंग्रेज अफसर और अपने साथी पंडित भगवती प्रसाद मिश्र के बीच हुए संवाद को शर्मा ने यथावत लिखा है- अधिकारी- कहो, कैसे हो?
मिश्र – हमारी बीमारी तो उसी तरह है
अधिकारी – क्यों, मर तो नहीं रहे हो
मिश्र – किसी के सर पटकने या कोसने से नहीं मर सकते। ईश्वर को जब तक जिंदा रखना है, किसकी ताकत है जो हमें मार सके।
अधिकारी- जवाब सुनकर, घूरने लगा। और वहां से चला गया। कई एकड़ जमीन और 23 से ज्यादा गांव के मालिक थे पंडित सुंदरलाल शर्मा पंडित शर्मा की परपौत्री पद्मा दुबे ने बताया कि राघोबा महाडिक के काल में पं.सुंदरलाल शर्मा के पिता पं.जियालालजी तिवारी उनके दरबार के प्रमुख सामंत थे। महाडिक बहुत उदार और कलाप्रेमी थे। पं. जियालाल की स्थिति एक सामंत की थी। उस समय के मुताबिक एक अच्छे कानूनविद थे। कांकेर राजदरबार में उनकी मान्यता थी। वहां के सलाहकार भी थे। वहां उनकी 22 गांवों की जागीर थी। राजिम के आसपास तीन बड़े गांव थे। एक तरह के वे स्वयं भी जागीरदार थे। पं.सुंदरलाल शर्मा उनके एकमात्र पुत्र थे। पिता भी कवि और संगीतज्ञ थे। पखावज बजाया करते थे। बाहर से आने वाले मेहमान कलाकारों के साथ संगत भी किया करते थे। उनका परिवार भी बहुत ही संपन्न और कलाप्रेमी था। वही पं. सुंदरलाल शर्मा जी को विरासत में मिला। लेकिन आजादी की लड़ाई लड़ते-लड़ते वो कर्जदार हो गए। बावजूद आज सरकार ने उन्हें भुला दिया।
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सोर्स:
महात्मा गांधी के गुरु पं.सुंदरलाल शर्मा की कहानी:1000 हरिजनों को मंदिर प्रवेश कराया,आजादी की लड़ाई में 22 गांवों की जागीर खोई,जेल से लिखा समाचार-पत्र

















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