कामना पूरी न करने वाले देवी-देवताओं को कठघरे में खड़ा करते हैं, उन्हें भंगाराम माई देती हैं एकांत में रखने, पूजा बंद करने जैसी सजा देवी-देवताओं को आरोपी के तौर पर कठघरे में खड़ा किया जाता है, यह सुनने में अटपटा लगता है। पर छत्तीसगढ़ में ऐसा होता है। यह आदिवासियों की परंपरा है। यहां कामना पूरी न करने वाले देवी-देवताओं को न्याय की देवी के रूप में भंगाराम माई की अदालत में कठघरे में खड़ा किया जाता है। वही इंसाफ करतीं हैं और आरोप सिद्ध होने पर उस देवी-देवता को एकांत में रखने, उनकी पूजा बंद करने और मृत्यु यानी उनकी प्रतिमा को हमेशा के लिए एक गड्ढेनुमा स्थान में दबा देने जैसी कठोर सजा भी मिलती है। माई की अदालत में महिलाओं की उपस्थिति वर्जित है। धमतरी जिले के नगरी ब्लॉक के कारीपानी व कुर्सीघाट के बीच जंगल में यह परंपरा सावन के समाप्त होने पर भाद्रपद के पहले सप्ताह में ही निभाई जाती है। आदिवासी इसे भादो जात्रा कहते हैं। इसमें स्थानीय समेत बस्तर संभाग से लेकर ओडिशा तक के देवी-देवता शामिल होते हैं। इसकी शुरुआत बस्तर राजघराने से हुई थी। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। मान्यता है कि जिन देवी-देवताओं की लोग पूजा करते हैं, अगर वे अपने कर्तव्य का पालन नहीं करें, तो उनके खिलाफ शिकायत होती है। फिर भंगाराम माई की अदालत में वादी को न्याय मिलता है। भंगाराम माई की उपस्थिति में गांवों से आए देवी-देवताओं और शैतानों की पहचान की जाती है। इसके बाद आंगा, डोली के साथ लाए गए मुर्गी, बकरी और डांग को खाईनुमा गड्ढे के किनारे दबाया जाता है। ग्रामीण इसे कारागार कहते हैं। आरोपी देवता की ओर से सिरहा-पुजारी-माझी देते हैं दलील प्रफुल्लचंद्र ठाकुर, पुजारी चेतराम मरकाम बताते हैं कि न्याय भंगाराम माई के दरबार में होता है। इसमें 16 परगना सिहावा, 7 पाली ओडिशा और 20 कोस बस्तर के देव विग्रह शामिल होते हैं। इस क्षेत्र में बिना माई की मान्यता के कोई देवी-देवता कार्य नहीं कर सकते। पीड़ित अपनी दलील देता है। वही आरोपी देवता की ओर से सिरहा, पुजारी, गायता, माझी, पटेल और गांव के अन्य प्रमुख लोग दलील देते हैं। दलील के आधार पर सजा तय होती है।
विश्व आदिवासी दिवस आज:बोराई के कुर्सीघाट में आदिवासी सदियों पुरानी न्याय की परंपरा निभा रहे

















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