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मूल्यों और मर्यादाओं के साथ राजनीति में प्रवेश करें युवा – डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। देश की बड़ी आबादी 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग की है। यह वर्ग न केवल देश की ऊर्जा और क्षमता का प्रतीक है, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक समूह भी है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या युवाओं को राजनीति में आना चाहिए? मेरा स्पष्ट मत है कि युवाओं को राजनीति में अवश्य आना चाहिए, लेकिन सकारात्मक सोच, लोकतांत्रिक मूल्यों और उत्कृष्ट आचरण इसकी पहली शर्त भी होनी चाहिए।

राजनीति किसी पद या पावर हासिल करने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण का सबसे प्रभावी मंच है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में राजनीति की जो छवि युवाओं के सामने बनी है, उसने अनेक प्रतिभाशाली युवाओं को इस क्षेत्र से दूर रखा है। सार्वजनिक जीवन में बढ़ती कटुता, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, चरित्र पर उठते सवाल और अनावश्यक टकराव की घटनाएँ युवाओं के मन में राजनीति के प्रति संशय पैदा करती हैं। लेकिन यह भी सच है कि किसी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए अच्छे लोगों का उसमें प्रवेश करना भी उतना ही आवश्यक होता है।

आज शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, तकनीक, पर्यावरण और उद्यमिता जैसे विषय युवाओं के जीवन को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। इन मुद्दों पर नीतियाँ बनाने वाले मंचों पर युवाओं की भागीदारी जितनी बढ़ेगी, निर्णय उतने ही प्रासंगिक और प्रभावी होंगे। इसलिए राजनीति में युवाओं की सक्रिय उपस्थिति केवल आवश्यकता ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए भी बेहद जरुरी है।

युवा नई सोच, नई ऊर्जा और इनोवेशन की क्षमता लेकर आते हैं। वे परिवर्तन को अवसर के रूप में देखते हैं और समस्याओं के समाधान के लिए नए दृष्टिकोण पेश करते हैं। यही कारण है कि दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में युवाओं की राजनीतिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा रहा है। भारत में भी समय की मांग है कि युवा केवल मतदाता बनकर न रहें, बल्कि नीति-निर्माण की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभाएँ।
हालांकि राजनीति में प्रवेश करने वाले युवाओं के लिए यह समझना अति आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन में सफलता का आधार केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि विश्वसनीयता होती है। किसी भी नेता की वास्तविक पहचान उसके चरित्र, उसके व्यवहार और जनता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से बनती है। जो व्यक्ति सम्मान, संवाद और सेवा के रास्ते पर चलता है, वही लंबे समय तक लोगों के विश्वास को बनाए रख सकता है।
महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान नेताओं ने अपने विचारों, कार्यों और नैतिक नेतृत्व से समाज को दिशा दी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्थायी नेतृत्व शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि सिद्धांतों और जनसेवा से निर्मित होता है। आज के युवाओं के लिए यही सबसे बड़ी प्रेरणा होनी चाहिए। राजनीति में आने वाले युवाओं को सबसे पहले जमीनी स्तर पर कार्य करना चाहिए। अपने क्षेत्र की समस्याओं को समझना, लोगों से संवाद करना और समाजहित के कार्यों में भागीदारी निभाना नेतृत्व की पहली पाठशाला है। जनता का विश्वास किसी भाषण से नहीं, बल्कि निरंतर कार्य और संवेदनशीलता से अर्जित किया जाता है।

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